यह मंत्र यजुर्वेद (३४.६)का है, जो 'शिवसंकल्प सूक्त' का हिस्सा है। यह मन की शक्ति, उसकी गति और उसके नियंत्रण पर प्रकाश डालता है।
ॐ यन्मनुष्यान्नेनीयतेऽभिशुभिर्वाजिन इव।
हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु।।
अर्थ (Meaning):
"जैसे एक कुशल सारथी लगाम के माध्यम से घोड़ों को नियंत्रित करता है और उन्हें सही दिशा में ले जाता है, वैसे ही जो मन मनुष्यों को निरंतर गतिशील रखता है; जो हृदय में स्थित है, जो कभी बूढ़ा नहीं होता (अजर) और अत्यंत वेगवान है—वह मेरा मन कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो।"
वैज्ञानिक व्याख्या (Scientific Perspective)
1. न्यूरोप्लास्टिसिटी और नियंत्रण: मंत्र में 'सारथी' और 'लगाम' का रूपक आधुनिक Neuroscience के 'Prefrontal Cortex' की तरह है। जैसे सारथी घोड़ों को रोकता है, वैसे ही मस्तिष्क का यह हिस्सा हमारी आदिम प्रवृत्तियों (Impulses) को नियंत्रित करता है। यह संकेत देता है कि मन को 'ट्रेन' किया जा सकता है।
2. जविष्ठं (अत्यंत वेगवान): विज्ञान मानता है कि विचार की गति विद्युत-चुंबकीय तरंगों (Electromagnetic waves) के समान होती है। मन एक सेकंड में दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने की कल्पना कर सकता है। यह 'Cognitive Processing' की असीमित क्षमता को दर्शाता है।
3. हृत्प्रतिष्ठं (Heart-Brain Connection): यद्यपि विचार मस्तिष्क में उत्पन्न होते हैं, लेकिन 'Heart-Brain Coherence' पर हुए शोध बताते हैं कि हमारे हृदय की धड़कन और भावनाओं का गहरा संबंध है। 'हृदय में स्थित' होने का अर्थ है भावनाओं और विवेक का केंद्र।
आध्यात्मिक व्याख्या (Spiritual Perspective)
1. शिवसंकल्प (शुभ विचार): आध्यात्मिक रूप से 'शिव' का अर्थ है 'कल्याण'। मन एक दोधारी तलवार है; यदि यह नकारात्मक है तो विनाशकारी है, और यदि यह 'शिवसंकल्प' से भरा है तो यह आत्म-साक्षात्कार का साधन है।
2. अजिरं (अजर/अविनाशी): शरीर वृद्ध होता है, कोशिकाएं मरती हैं, लेकिन 'चेतना' या 'मन की ऊर्जा' कभी पुरानी नहीं होती। सूक्ष्म शरीर (Subtle body) के रूप में मन की ऊर्जा निरंतर बनी रहती है।
3. सारथी और अश्व: कठोपनिषद में भी शरीर को रथ, इंद्रियों को घोड़े और मन को लगाम कहा गया है। यदि लगाम (मन) आत्मा (रथी) के हाथ में है, तो जीवन सफल है। यदि मन अनियंत्रित है, तो जीवन पतन की ओर जाता है।
निष्कर्ष
यह मंत्र हमें 'Mindfulness' (सजगता) का संदेश देता है। यह प्रार्थना है कि हमारी मानसिक ऊर्जा व्यर्थ की चिंताओं में न भटके, बल्कि सृजन और लोक-कल्याण (Public welfare) के मार्ग पर चले।
आज का विचार:** आपका मन ही आपका सबसे अच्छा मित्र बन सकता है, यदि आप इसके सारथी स्वयं बनें।
मनुष्य चाहे कितनी भी उपाधि यश, प्रतिष्ठा क्यों न प्राप्त कर लिया हो; जीवन पथ पर रोग, अभाव, विश्वासघात, हानि, वियोग, अपमान, अन्याय से सम्बन्धित दुःख आ ही जाते हैं। ऐसी प्रतिकूल परिस्थिति में मनुष्य चिन्तित, निराश एवं आशान्त हो जाता है और विचारों पर नियन्त्रण ना रख पाने के कारण जीवन को ही समाप्त करने की सोचता है अथवा क्रोध के वशीभूत होकर अनिष्ट कर लेता है।
मन में उठने वाले प्रतिकूल विचारों को रोकने में समर्थ हो अथवा इस समस्याओं का यथोचित समाधान निकाल ले तो उपर्युक्त अनर्थों से बच सकता है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, ईर्ष्या, द्वेश आदि मानसिक रोग ऐसे हैं,जिनका समाधान धन-संपत्ति से कदापि सम्भव नहीं हो सकता। इसका समाधान तो आत्मा-परमात्मा सम्बन्धी अध्यात्मविद्या
को पढ़, सुन, समझ तथा व्यवहार में लाने से ही सम्भव है। मनुष्यों के कल्याणार्थ इन अध्यात्म विद्याओं का वर्णन हमारे पूज्य ऋषियों ने अपने दर्शनों में विस्तार से किया है।
दर्शनों में वर्णित आत्मा, परमात्मा, मन, बुद्धि, संस्कार, दोष, कर्म, कर्म-फल, पुनर्जन्म, बन्धन-मुक्ति, सुख-दुःख आदि सूक्ष्म तत्वों के यथार्थ स्वरूप को न समझने के कारण ही आज सम्पूर्ण मानव समाज में हिंसा, झूठ, चोरी-जारी तथा अन्य नैतिक दोष उत्पन्न हो गए हैं।
वैदिक काल में मन इन्द्रियों को रोककर आत्मा साक्षात्कार करने की इस क्रिया का बहुत ही महत्व था। ब्रह्म मुहूर्त में उठकर एकान्त-शान्त स्थान में आसन लगाकर प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि लगाने की सूक्ष्म क्रियाएं ऋषि मुनि लोग मृत्यु पर्यन्त किया करते थे।
योगदर्शन में इस क्रिया को 'योग' ( समाधि, उपासना ) नाम से कहा गया है। जीवात्मा चेतन है, ज्ञानी है, कर्ता है। मन आदि जड़ पदार्थों का चालक है। जो मनुष्य अपने मन को समस्त सांसारिक विषयों से हटाकर सर्वव्यापक, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, नित्य, निराकार, पवित्र तथा आनन्दस्वरूप परमेश्वर में स्थित कर लेता है वह समस्त शारीरिक तथा मानसिक दुःखों से रहित हो जाता है और ईश्वर से ज्ञान, बल, आनन्द, निर्भयता स्वतंत्रता आदि गुणों को प्राप्त करता है। यही योगासन का फल है।
योगाभ्यासी अपने मन में विद्यमान काम क्रोध लोभ मोह अहंकार ईर्ष्या द्वेष आदि कुसंस्कारों को स्पष्ट रूप से अनुभव करके उनको विविध उपायों से नष्ट करने में सफल हो जाता है। समस्त दुःखों की निवृत्ति मुक्ति प्राप्त कर लेने पर ही होती है। मुक्ति अविद्या के संस्कारों के नष्ट होने पर सम्भव है। अविद्या के संस्कार ईश्वर साक्षात्कार के बिना नष्ट नहीं हो सकते और ईश्वर साक्षात्कार समाधि के बिना नहीं हो सकता।समाधि चित्तवृत्ति निरोध का नाम है। चित्तवृत्तियों का निरोध यम नियम आदि योग के इन आठ अङ्गों का पालन करने से होता है।
🔥ओ३म् यन्मनुष्यान्नेनीयतेऽभिशुभिर्वाजिन इव।हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु।।
🌷 (इव) जिस प्रकार (सुषारथि:) अच्छा सारथी (अभीशुभि:) राशियों के द्वारा (अश्वान्) घोड़ों को (नेनीयते) सही मार्ग पर ले जाता है, उसी प्रकार (यत्) जो मन (मनुष्यान्) मनुष्यों को (वाजिन: इव) घोड़ों की तरह (नेनीयते) सही मार्ग पर ले जाता है (यत्) जो मन (हृत्प्रतिष्ठं) हृदय में आत्मा के साथ प्रतिष्ठित है (अजिरं) जो जवान है (जविष्ठं) वेगवान है (तत् मे मन:) वही मेरा मन (शिव संकल्पं अस्तु) कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो।
यह मंत्र स्पष्ट रूप से बता रहा है कि मन आत्मा के साथ हृदय में पदस्थापित है, जवान है और निरंतर वेगवान है। शरीर बूढ़ा हो जाता है, परंतु मन कभी बूढ़ा नहीं होता। यही मन मनुष्यों को सही मार्ग पर ले जाता है। इसलिए मन की महिमा अपरंपार है।
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