वैदिक सुख और शांति: घर में प्रवेश का पावन मंत्र
क्या आपने कभी गौर किया है कि जब हम लंबे समय बाद अपने घर लौटते हैं, तो एक असीम शांति का अनुभव होता है? हिंदू धर्म के प्राचीन ग्रंथ **यजुर्वेद** में घर को केवल ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं, बल्कि ऊर्जा और प्रेम का केंद्र माना गया है।
आज हम यजुर्वेद के एक ऐसे ही प्रभावशाली मंत्र की व्याख्या करेंगे, जो घर की सुख-समृद्धि और मानसिक शांति के लिए अद्भुत मार्गदर्शक है।
**मूल मंत्र**
ओ३म् गृहा मा बिभीत मा वेपध्वमूर्जं बिभ्रत एमसि।
ऊर्जं बिभ्रद्वः सुमनाः सुमेधा गृहानैमि मनसा मोदमानः ॥(यजुर्वेद ३/४१)
मंत्र का सरल अर्थ
इस मंत्र में घर का स्वामी (गृहपति) जब घर लौटता है, तो वह अपने घर को संबोधित करते हुए कहता है:
"हे मेरे घर! तुम मुझसे डरो मत, और न ही कांपो (अर्थात् विचलित न हो)। मैं तुम्हारे भीतर 'ऊर्जा' और 'शक्ति' लेकर आ रहा हूँ। मैं श्रेष्ठ मन और उत्तम बुद्धि के साथ, प्रसन्नचित्त होकर अपने घर में प्रवेश कर रहा हूँ।"
मंत्र की गहराई: चार मुख्य स्तंभ
इस मंत्र के चार गहरे मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक अर्थ निकलते हैं:
1. निर्भयता (मा बिभीत): घर का वातावरण ऐसा होना चाहिए जहाँ भय का कोई स्थान न हो। घर के सदस्यों और स्वयं घर की ऊर्जा के बीच एक सुरक्षात्मक बंधन होना चाहिए।
2. ऊर्जा का संचार (ऊर्जं बिभ्रत): हम घर से बाहर दुनिया भर की थकान और तनाव लेकर लौटते हैं। लेकिन यह मंत्र हमें याद दिलाता है कि हमें घर में नकारात्मकता नहीं, बल्कि ऊर्जा (Vitality) लेकर प्रवेश करना चाहिए।
3. सकारात्मक मानसिकता (सुमनाः सुमेधा): 'सुमनाः' का अर्थ है सुंदर मन और 'सुमेधा' का अर्थ है श्रेष्ठ बुद्धि। घर में प्रवेश करते समय कलह या द्वेष को बाहर छोड़ देना चाहिए। जब हम शांत और समझदार होकर घर में कदम रखते हैं, तो घर स्वर्ग बन जाता है।
4. आनंद का भाव (मोदमानः): 'मोदमान' का अर्थ है प्रसन्नता। खुश होकर घर में घुसने से घर की दीवारों में भी सकारात्मक तरंगें (Vibrations) प्रवाहित होने लगती हैं।
आज के जीवन में उपयोगिता
आज के भागदौड़ भरे जीवन में हम अक्सर ऑफिस का तनाव घर ले आते हैं, जिससे घर का माहौल भारी हो जाता है। यह मंत्र हमें एक 'मेंटल रीसेट' की तकनीक सिखाता है:
द्वार पर रुकें: घर में प्रवेश करने से पहले एक क्षण रुकें और इस मंत्र का स्मरण करें।
तनाव त्यागें: यह सोचें कि आप अपने परिवार के लिए ऊर्जा और खुशियाँ लेकर जा रहे हैं।
शांति का संकल्प: संकल्प लें कि आप घर के भीतर अपनी बुद्धि और मन को शांत रखेंगे।
ब्रह्मविज्ञान (Metaphysics/Divine Science) के दृष्टिकोण से यह मंत्र केवल ईंट-पत्थर के मकान में प्रवेश का सूचक नहीं है, बल्कि यह 'जीवात्मा' और 'ब्रह्म' के अंतर्संबंधों की एक गहरी व्याख्या है।
यहाँ इस मंत्र की ब्रह्मविज्ञान के आधार पर आध्यात्मिक विवेचना दी गई है, जिसे आप अपने ब्लॉग में जोड़ सकते हैं:
ब्रह्मविज्ञान के आलोक में मंत्र की व्याख्या
ब्रह्मविज्ञान के अनुसार, यह मंत्र हमारे स्थूल शरीर (Physical Body) और सूक्ष्म ब्रह्मांड के मिलन का प्रतीक है। आइए इसे गहरे दार्शनिक स्तर पर समझते हैं:
१. 'गृह' का आध्यात्मिक अर्थ: यह शरीर ही घर है
ब्रह्मविज्ञान में इस नश्वर शरीर को 'नौ द्वारों वाला नगर' या 'घर' कहा गया है। जब जीवात्मा इस शरीर रूपी घर में चैतन्य होकर प्रवेश करती है, तो वह आत्मिक शक्ति से संपन्न होती है। मंत्र कहता है—"मा बिभीत" (डरो मत)। यह उस भय की समाप्ति है जो अज्ञानता के कारण होता है। जब साधक को यह बोध हो जाता है कि वह साक्षात् ब्रह्म का अंश है, तो शरीर और आत्मा का द्वैत (Duality) समाप्त हो जाता है और भय का लोप हो जाता है।
२. 'ऊर्जं' का अर्थ: प्राण और ब्रह्म-शक्ति
मंत्र में 'ऊर्जं' शब्द भौतिक ऊर्जा मात्र नहीं है, बल्कि यह 'प्राण शक्ति' है। ब्रह्मविज्ञान कहता है कि परमात्मा ही ऊर्जा का मूल स्रोत है।
ऊर्जं बिभ्रत एमसि: "मैं उस ब्रह्म-तेज को धारण करके इस देह-रूपी घर में स्थित हूँ।"
जब हम इस भाव से घर में प्रवेश करते हैं कि हम 'ईश्वर के अंश' हैं, तो हम अपने साथ ईश्वरीय प्रकाश लेकर आते हैं, जो घर के अंधकार (नकारात्मकता) को मिटा देता है।
३. 'सुमनाः सुमेधा': ऋतंभरा प्रज्ञा की प्राप्ति
सुमनाः: यह वह अवस्था है जहाँ मन सांसारिक विकारों से मुक्त होकर 'सत्' में स्थित हो जाता है।
सुमेधा: यह साधारण बुद्धि नहीं, बल्कि 'ऋतंभरा प्रज्ञा' (वह बुद्धि जो सत्य को ग्रहण करती है) है।
ब्रह्मविज्ञान के अनुसार, जब मनुष्य का विवेक जागृत होता है, तभी वह 'सुमेधा' बनता है। ऐसे विवेकशील व्यक्ति के घर में ही साक्षात् लक्ष्मी और सरस्वती का वास होता है।
४. 'मोदमानः': आनंदस्वरूप ब्रह्म
उपनिषद कहते हैं—"आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्" (आनंद ही ब्रह्म है)।
मंत्र का अंतिम शब्द 'मोदमानः' (प्रसन्नता) उस आत्मिक आनंद की ओर संकेत करता है जो बाहरी परिस्थितियों पर निर्भर नहीं है। जब मनुष्य ब्रह्म ज्ञान से तृप्त होकर घर लौटता है, तो वह 'भोगी' की तरह नहीं बल्कि 'योगी' की तरह आनंदित होता है। उसका घर एक 'आश्रम' बन जाता है जहाँ मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है।
सूक्ष्म और स्थूल का मिलन
ब्रह्मविज्ञान की दृष्टि से यह मंत्र हमें सिखाता है कि:
अहं ब्रह्मास्मि: मैं शक्ति का पुंज हूँ, मैं दीन-हीन होकर नहीं, बल्कि ओजस्वी होकर संसार (घर) में विचरण करूँ।
सर्वं खल्विदं ब्रह्म: मेरा घर और उसके कण-कण में उसी एक ब्रह्म की सत्ता है, इसलिए वहाँ केवल प्रेम और शांति का ही अधिकार है।
ब्लॉग टिप: इस मंत्र का प्रतिदिन जप न केवल घर के वास्तु दोषों को मानसिक स्तर पर शांत करता है, बल्कि व्यक्ति के भीतर 'आत्म-बोध' की अग्नि को भी प्रज्वलित करता है।
निष्कर्ष
यजुर्वेद का यह मंत्र हमें सिखाता है कि **"घर"** केवल एक स्थान नहीं, बल्कि हमारे विचारों का प्रतिबिंब है। यदि हम प्रसन्न मन और ओजस्वी ऊर्जा के साथ घर में रहेंगे, तो वहां दरिद्रता और कलह कभी वास नहीं करेगी।
🔥महर्षि दयानंद के जीवन की ब्रह्मचर्य को लेकर कुछ ऐसी सत्य घटनाएँ है, जो आश्चर्यजनक है किन्तु सत्य है । यह दृष्टान्त आज के युवाओं के लिए प्रेरणा के स्त्रोत हो सकते है । इस उद्देश्य को लेकर उनमें से एक दृष्टान्त का उल्लेख इस लेख में किया गया है ।
उदयपुर के महाराणा सज्जन सिंह महर्षि दयानंद के मित्र थे । बाद में शिष्य बन गये । एक बार महर्षि दयानंद से उदयपुर गये तब महाराणा सज्जन सिंह उनके निवास स्थान पर उनसे मिलने गये ।
महाराणा सज्जन सिंह ने कहा – “मैं धन्य हो गया, स्वामीजी ! जो आपके परम पवित्र चरण मेरी राजधानी में पड़े । मैं चिरकाल से आपके आगमन की प्रतीक्षा कर रहा था । सारा उदयपुर आपके दर्शन के लिए उत्सुक था ।” इस तरह प्रणाम करते हुए महाराणा ने स्वामीजी का स्वागत किया ।
मुस्कुराते हुए स्वामीजी बोले – “ चिरंजीव हो !” कुर्सी की ओर संकेत करते हुए कहा –“आइये ! विराजिये !”
महाराणा – “ नहीं नहीं स्वामीजी ! मैं नीचे ही ठीक हूँ ।” इस तरह शालीनता का परिचय देते हुए महाराणा नीचे बैठ गये ।
इसके बाद एक दुसरे की कुशल क्षेम पूछने के बाद महाराणा ने स्वामीजी से उपदेश देने के लिए आग्रह किया ।
तब स्वामीजी बोले – “ राजन ! मुझे यह देखकर बड़ा दुःख होता है कि प्रत्येक भारतीय विषय वासना में पड़कर अपने मन और शरीर के ओज को खो रहा है । निरंतर बढ़ती विलासिता ब्रह्मचर्य जैसे पवित्र को विचार को धूमिल करती जा रही है । साधनों से संपन्न लोग जैसे राजा और उनके सेवकों पर वासना का भूत बुरी तरह से हावी है । जिसके कारण वे अपने राजकाज के कार्य भी यथाविधि संपन्न नहीं कर पाते । यदि ऐसे ही चलता रहा तो जल्द ही पुरे भारत पर मानसिक गुलामी छा जाएगी ।”
महाराणा बोले – “ आपकी बात सही है, स्वामीजी ! निसंदेह मनुष्य ब्रह्मचर्य से दूर होकर पाप की ओर बढ़ रहा है । लेकिन ब्रह्मचर्य की ऐसी शिक्षा का व्यापक स्तर पर शिक्षण भी तो संभव नही ।
स्वामीजी बोले – “ क्यों संभव नहीं ? ब्रह्मचर्य की महिमा और शक्ति को उत्तमता से बताकर इस अधर्म और अत्याचार से लोगों को बचाया जा सकता है ।”
तब महाराणा बोले – “स्वामीजी ! आप एक बार जोधपुर जाकर महाराज यशवंत सिंह की को संयम की महिमा बताइए । हो सकता आपके कहने से वो सही राह पर आ जाये ।”
स्वामीजी – “ जी मैं जोधपुर अवश्य जाऊंगा और महाराज यशवंत सिंह को इस महापाप से मुक्ति दिलाऊंगा ।” इतना कहकर स्वामीजी और महाराणा दोनों खड़े हो गये और बाहर की ओर चलने लगे । जाते – जाते महाराणा स्वामीजी को संदेह से देख रहा था ।
आखिरकार महाराणा बोल उठा – “ स्वामीजी ! आप ब्रह्मचर्य की बड़ी महिमा गाते है, बड़ी शक्ति बताते है । जहाँ तक मुझे पता है, सभी आपको अखण्ड ब्रह्मचारी भी मानते है । किन्तु मुझे तो आपमें कोई विशेष शक्ति दृष्टिगोचर नहीं होती ।
राजा की यह बात सुनकर स्वामीजी उसकी दुविधा समझ गये और बोले – “ क्या आपने कभी मेरी शक्ति की परीक्षा की है ? बिना परीक्षा किये आप अपने मन से कुछ भी अनुमान लगा सकते है । आपको पता भी है ! भारतवर्ष में चिरकाल से एक बाल विवाह की एक ऐसी बीमारी चली आ रही है जो ब्रह्मचर्य आश्रम को कभी पूरा नहीं होने देती है । संभवतः मेरे माता – पिता का भी ब्रह्मचर्य आश्रम पूर्ण नहीं हुआ होगा । जिसका प्रभाव संतान पर पड़ना अवश्यंभावी है । जब मूल ही कच्ची है तो वृक्ष क्या खाक चलेगा । जब शरीर का विकास ही नहीं हुआ तो बल और बुद्धि का विकास कहाँ से होगा ? उस समय की कल्पना करो जब भीष्म और भीम जैसे धुरंधर योद्धा हुए । अर्जुन और कर्ण जैसे धनुर्धर हुए । राम और लक्ष्मण जैसे परमवीर हुए । जिन्हें इतिहास आज भी जानता है ।”
यह सुनकर महाराणा बोला – “ संभव है स्वामीजी ! आपकी बात सही हो और आज के ब्रह्मचर्य पालन में पहले जैसी शक्ति न रही हो, लेकिन फिर भी एक ब्रह्मचारी और एक गृहस्थ में कोई तो विशेष अंतर होना चाहिए ना । यदि ऐसा कोई प्रत्यक्ष प्रमाण आप दे सके, मुझे भी विश्वास हो जाये ”
स्वामीजी मुस्कुराते हुए बोले – “ अच्छी बात है, जब समय आएगा तो आपको इसका प्रमाण भी मिल जायेगा ।”
जाते – जाते महाराणा बोला – “ माफ़ कीजियेगा स्वामीजी ! आपको बुरा लगा हो तो । मेरी दुविधा थी अतः पूछ लिया । बाकि आप तो हमारे गुरु है । प्रणाम !”
स्वामीजी – “ इसमें माफ़ी मांगने जैसा कुछ नहीं । आपने अपने मन की शंका मुझे बताई, यह तो अच्छी बात है ।”
यह कहकर महाराणा अपने अपने दो धोड़े की बग्घी पर सवार हो गया और अपने सारथि से बोला, “चलो !” सारथि ने घोड़ो चलने का इशारा दिया । लेकिन घोड़े चले नहीं । उसने हंटर बरसाना शुरू कर दिया लेकिन बग्घी जहाँ की तहाँ खड़ी हिलने का नाम नहीं ले रही थी । बिचारे घोड़े उसी जगह कूद – कूदकर थक गये । तभी महाराज ने पीछे मुड़कर देखा तो देखकर हैरान रह गये । अखण्ड ब्रह्मचारी महर्षि दयानंद ने बग्घी का एक पहिया अपने एक हाथ से पकड़ रखा था ।
🌷ओ३म् गृहा मा बिभीत् मा वेपध्वमूर्जं बिभ्रत एमसि।ऊर्जं बिभ्रद्वः सुमनाः सुमेधा गृहानैमि मनसा मोदमानः ।।यजुर्वेद ३\४१ ।।
💐 :- युवा को पूर्ण ब्रह्मचर्याश्रम को सेवन करके युवावस्था में स्वयंवर के विधान की रीति से दोनों के तुल्य स्वभाव, विद्या, रूप, बुद्धि और बल आदि गुणों को देखकर विवाह कर तथा शरीर-आत्मा के बल को सिद्ध कर और पुत्रों को उत्पन्न करके सब साधनों से अच्छे-अच्छे व्यवहारों में स्थित रहना चाहिए तथा किसी मनुष्य को गृहस्थाश्रम के अनुष्ठान से भय नहीं करना चाहिए, क्योंकि सब अच्छे व्यवहार वा सब आश्रमों का यह गृहस्थाश्रम मूल है, इस गृहस्थाश्रम का अनुष्ठान अच्छे प्रकार से करना चाहिए । इस गृहस्थाश्रम के बिना मनुष्यों की वा राज्यादि व्यवहारों की सिद्धि कभी नहीं होती ।
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