Rigveda Sukta 36, Gyan Vigyan Brahmgyan, Vedic Physics, Consciousness and Mind, Manoj Pandey, Vedic Science ऋग्वेद मण्डल १ | सूक्त ३६ (मंत्र १ से १०) अंकुरण से मृत्युंजयी विज्ञान: चेतना और जैविक मन का भौतिक सार्वभौमिक सत्य ऋषि: कण्व घोर | तत्व-मीमांसा: मनोज पांडेय 🌌 प्राक्कथन: दृश्य आडंबर से परम प्रकाश तक ऋग्वेद का यह सूक्त केवल पारंपरिक पूजा-पाठ की ऋचाएं नहीं है, बल्कि यह इस ब्रह्मांड और मानव शरीर के भीतर काम करने वाले भौतिक सार्वभौमिक सत्य (Physical Universal Truth) का साक्षात वैज्ञानिक दस्तावेज…
ओ३म् ऋग्वेद के चतुर्थ मण्डल के नवें सूक्त का यह पहला मन्त्र (ऋग्वेद ४.९.१) अग्नि देव की स्तुति और यज्ञीय भावना को प्रकट करता है। इस मन्त्र के ऋषि वामदेव गौतम हैं, देवता अग्नि हैं और छन्द गायत्री है। पदच्छेद और मन्त्र ओ३म् अग्ने मृळ महाँ असि य ईमा देवयुं जनम् । आ ये बर्हिः आसदम् ॥ शब्दार्थ (Word-by-Word Meaning) अग्ने : हे अग्निदेव! (ज्ञानस्वरूप और प्रकाशमान प्रभु) मृळ: (हमें) सुखी करो, हम पर कृपा करो। महान् असि: आप महान् हैं, सर्वशक्तिमान् हैं। यः जो आप (ऐसे महान् हैं)। ईम् (ईमा): इस (प्रकार के)। देवयुम् : देवों की कामना करने वाले, दिव्य …
ऋग्वेद मंत्र व्याख्या, Rigveda 10.44.6, आध्यात्मिक व्याख्या, वेद विज्ञान, मानव शरीर रूपी नौका, यज्ञीयां नावम्, पृथक् प्रायन्प्रथमा, वैदिक सूक्त, आत्म-अन्वेषण, ज्ञान विज्ञान ब्रह्मज्ञान। यह मंत्र ऋग्वेद के १०वें मण्डल के ४४वें सूक्त का ६ठा मंत्र है। यह आध्यात्मिक और भौतिक उन्नति के मार्ग को एक सुंदर रूपक (नाव के उदाहरण) के माध्यम से समझाता है। नीचे इस मंत्र की शब्द-दर-शब्द (पदपाठ के अनुसार) और विस्तृत व्याख्या दी गई है: मूल मंत्र ओ३म् पृथक् प्रायन्प्रथमा देवहुतयोऽकृण्वत श्रवस्यानि दुष्टरा। न ये शेकुर्यज्ञीयां नावमारुहमीर्मेव ते न्यविशन्त केपय:…
Rigveda Swasti Mantra Interpretation: A Vedic Blueprint for an Exploitation-Free Society & Equal Resource Distribution 🔥 अपने भीतर झाको, अपने भीतर को संवारो!!! बाहर से देखने में तुम कितने सुन्दर दिखते हो! शरीर सुन्दर, शक्ल सुन्दर, वस्त्र सुन्दर, आभूषण सुन्दर, केश सुन्दर, बातचीत सुन्दर, वाणी सुन्दर, उठना-बैठना सुन्दर, घर सुन्दर, आँगन सुन्दर, किचन सुन्दर। सब सुन्दर प्रन्तु भीतर कुछ भी सुन्दर नही है, सब अस्त-व्यस्त है, सब ऊटपटांग है, सब बेसिर-पैर है, सब बे-सुरा है, सब भद्दा है, सब असंगत है। भीतर इतना गन्दा क्यों भर रखा है? इतना…
तच्चक्षुर्देवहितं मंत्र वैज्ञानिक अर्थ, सूर्य उपस्थान मंत्र रहस्य, Cosmic Cryopreservation in Vedas, डीएनए और वैदिक प्रलय। 🌷 ओ३म् तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्छरत् । पश्येम शरद:शतं जीवेम शरद: शतं श्रुणुयाम शरद: शतं , प्रब्रवाम शरद: शतमदीना: स्याम शरद: शतं भूयश्च शरद: शतात् 💐अर्थ:- हे जगत पिता , सर्व व्यापक , सर्वशक्तिमान , अनादि-अनन्त प्रभो ! आप सब कुछ देखने वाले , शुद्ध और पवित्र है ।आपकी कृपा से हम ऐसे स्वस्थ रहे कि सौ वर्ष तक देख सके , सौ वर्ष तक जीवित रह सके , सौ वर्ष तक सुनते रह सके , सौ वर्ष तक बोलते रह सके । सौ वर्ष तक दीन…
अतः आओ धर्म की ओर चलें।। आओ वेदों की ओर चलें | 🌷 ओ३म् स्वस्तये वायुमुप ब्रवामहै सोमं स्वस्ति भुवनस्य यस्पति। बृहस्पतिं सर्वगणं स्वस्तये स्वस्तय आदित्यासो भवन्तु न:।। 🕉️ अर्थ :- वायु को गति तथा चन्द्रमा को सोम रस देने वाला सबसे महान जगत् का स्वामी परमेश्वर हमारे लिए कल्याणकारी हो।सब समूह वाले बड़े-बड़े ब्रह्माण्डों व वेद ज्ञान के रक्षक परमात्मा की हम स्तुति करते हैं। हे प्रभु ! बड़े विद्वान, भक्त, शूरवीर, आदित्य ब्रह्मचारी पुत्र हमारे कल्याण के लिए हो । ऋग्वेद स्वस्ति मंत्र, ओ३म् स्वस्तये वायुमुप ब्रवामहै, ब्रह्मांडीय कंपास ऋत, त्रि…
चारों वेद ============= वेद सृष्टि के आदि में परमात्मा द्वारा दिया गया दिव्य अनुपम ज्ञान हैं । वेद सार्वभौमिक और सार्वकालीन है । सृष्टी बन गई तो इसमें रहने का कुछ विधान भी होगा उसी विधान का नाम है वेद । वेद चार हैं - ऋग्वेद , यजुर्वेद , सामवेद और अथर्ववेद । चारों वेद चार ऋषियों के हृदय मे मैं एक एक साथ प्रकट हुए । ऋषियो ने वेद की रचना नहीं की । यह ज्ञान तो परमात्मा ने अपनी करुण कृपा से उनके हृदय में उँड़ेल दिया था । वेद का ज्ञान सृष्टि के आदि में परमात्मा ने अग्नि , वायु , आदित्य और अंगिरा इन चारो ऋषियों के हृदय मे प्रगट कि…