वैदिक ऋचाएं और आधुनिक विज्ञान: एक गहन विश्लेषण

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वैदिक ऋचाएं और आधुनिक विज्ञान

यजुर्वेद और केनोपनिषद के आलोक में प्रकृति और चेतना का विश्लेषण

1. यजुर्वेद (१८:४५) - वायुमंडल और जल चक्र का विज्ञान

"ओ३म् समुद्रोऽसि नभस्वानार्द्रदानु: शम्भूर्मयोभूरभि मा वाहि स्वाहा... मारुतोऽसि मरुतां गण:..."

वैज्ञानिक व्याख्या:

  • समुद्रोऽसि नभस्वान: यहाँ वायु को 'समुद्र' (व्यापक) और 'नभस्वान' (बादलों को धारण करने वाली) कहा गया है। आधुनिक विज्ञान के अनुसार, वायुमंडल एक 'गैसीय महासागर' की तरह है जो नमी को वाष्प के रूप में संचित करता है।
  • आर्द्रदानु: इसका अर्थ है 'नमी प्रदान करने वाला'। यह Water Cycle (जल चक्र) की उस प्रक्रिया को दर्शाता है जहाँ हवाएं आर्द्रता (Humidity) को एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाकर वर्षा करती हैं।
  • शम्भू: और मयोभूर: वायु केवल सांस लेने के लिए नहीं, बल्कि आरोग्य (Health) और सुख देने वाली है। यह पराबैंगनी विकिरण से सुरक्षा और जीवन के अनुकूल तापमान बनाए रखने वाले 'Greenhouse Effect' के संतुलन को भी इंगित करता है।
  • मारुतोऽसि मरुतां गण: वायु कणों का समूह है। यह Kinetic Theory of Gases की तरह है, जहाँ हवा विभिन्न गैसों और ऊर्जावान कणों का एक व्यवस्थित समूह है।

2. केनोपनिषद - दृश्य जगत और मूल ऊर्जा (Quantum Consciousness)

"ओ३म् यच्चक्षुषा न पश्यति येन चक्षूंषि पश्यन्ति। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते॥"

वैज्ञानिक व्याख्या:

भावार्थ: जिसे आँखों से नहीं देखा जा सकता, बल्कि जिससे आँखें देखने की शक्ति पाती हैं, वही ब्रह्म है।

  • न्यूरोसाइंस (Neuroscience): हमारी आँखें केवल 'प्रकाश' (Photons) को ग्रहण करती हैं, लेकिन 'देखने' की अनुभूति मस्तिष्क के भीतर मौजूद चेतना (Consciousness) से होती है। आँखें केवल एक माध्यम (Sensor) हैं, दृष्टा (Observer) नहीं।
  • क्वांटम भौतिकी (Quantum Physics): पदार्थ का अंतिम स्वरूप परमाणु नहीं, बल्कि ऊर्जा और 'Information' है। यह मंत्र उस 'Non-local Reality' की ओर इशारा करता है जो दृश्य जगत का आधार है लेकिन स्वयं इंद्रियों की पकड़ से बाहर है।
  • अदृश्य ऊर्जा: जैसे विद्युत (Electricity) को हम सीधे नहीं देख सकते, लेकिन उसके प्रभाव (बल्ब का जलना) को देखते हैं, वैसे ही ब्रह्म वह 'Source Code' है जिससे यह पूरी सृष्टि क्रियाशील है।
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ओ३म् समुद्रोऽसि नभस्वानार्द्रदानु: शम्भूर्मयोभूरभि मा वाहि स्वाहा मारुतोऽसि मरुतां गण: शम्भूर्मयोभूरभि मा वाहि स्वाहाऽवस्यूरसि दुवस्वाञ्छम्भूर्मयोभूरभि मा वाहि स्वाहा॥ ( यजुर्वेद १८:४५ )

  🔥ओ३म् यच्चक्षुषा न पश्यति येन चक्षूंषि पश्यन्ति। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते॥  (केनोपनिषद)

  अर्थात जो आंख से नहीं दीख पड़ता और जिस से सब आंखें देखती हैं उसी को तू ब्रह्म जान और उसी की उपासना कर। और जो उस से भिन्न सूर्य,चंद्र,विद्युत,अग्नि आदि जड़ पदार्थ है उन की उपासना मत कर॥

  ईश्वर विश्वास पर ही मानव प्रगति का इतिहास टिका हुआ है। जब यह डगमगा जाता है तो व्यक्ति इधर-उधर हाथ पांव फेंकता विक्षुब्ध मनः स्थिति को प्राप्त होता दिखाई देता है। ईश्वर चेतना की वह शक्ति है जो ब्रह्माण्ड के भीतर और बाहर जो कुछ है,उस सब में व्याप्त है। विश्व व्यवस्था का संचालक होते हुए भी वह दिखाई नहीं देता क्योंकि वह निराकार है सर्वव्यापक है। शायद इसी वजह से एक प्रश्न साधारण मानव के मन में उठता रहा है की ईश्वर कौन है, कहां है, कैसा है?

  विज्ञान अब धीरे-धीरे ईश्वर की सत्ता स्वीकार करने की स्थिति में पहुंचता जा रहा है। जान अटुअर्ट मिल का कथन सचाई के बहुत निकट है कि विश्व की रचना में प्रयुक्त हुई नियमबद्धता और बुद्धिमत्ता को देखते हुए ईश्वर की सत्ता स्वीकार की जा सकती है। भौतिक विज्ञान का विकास आज आशाजनक मात्रा में हो चुका है। यदि विज्ञान की यह मान्यता सत्य होती कि अमुक प्रकार के अणुओं के अमुक मात्रा में मिलने से चेतन तत्व उतपन्न होते हैं तो इसे प्रयोगशालाओं में प्रमाणित किया गया होता। कोई कृत्रिम चेतन प्राणी अवश्य पैदा कर ली गई होती अथवा मृत शरीरों को जीवित कर लिया गया होता।

    यदि वस्तुतः अणुओं के सम्मिश्रण पर ही चेतना का आधार रहा होता तो मृत्यु पर नियंत्रण करना मनुष्य के वश से बाहर की बात न होती। 

सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक रिचार्डन ने लिखा है-विश्व की अगणित समस्याओं तथा मानव की मानसिक प्रतिक्रियाएं वैज्ञानिक साधनों, गणित तथा यन्त्रों के आधार पर हल नहीं होतीं।भौतिक विज्ञान से बाहर भी एक अत्यन्त विशाल दुरूह अज्ञात क्षेत्र रह जाता है जिसे खोजने के लिए कोई दूसरा साधन करना पड़ेगा। भले उसे अध्यात्म कहा जाय या कुछ और।  

   आधुनिक विज्ञानवेत्ता ऐसी संभावना प्रकट करने लगे हैं कि निकट भविष्य में ईश्वर का अस्तित्व वैज्ञानिक आधार पर भी प्रामाणिक हो सकेगा। जो आधार विज्ञान को अभी प्राप्त हो सके हैं वे अपनी अपूर्णता के कारण आज ईश्वर का प्रतिपादन कर सकने में समर्थ भले ही न हों पर उनकी संभावना से इंकार कर सकना उनके लिए भी सम्भव नहीं है। विज्ञान का क्रमिक विकास हो रहा है। उसे उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर अपनी मान्यताओं को समय समय पर बदलना पड़ता है। 

कुछ दिन पहले तक वैज्ञानिक पृथ्वी की आयु केवल सात लाख वर्ष मानते थे और भारतीय ज्योतिर्विदों की उस उक्ति का उपहास उड़ाते थे जिसके अनुसार पृथ्वी की आयु एक अरब 67 करोड़ वर्ष मानी गई है। अब रेडियम धातु तथा यूरेनियम नामक पदार्थ के आधार पर जो शोध हुए हैं उससे पृथ्वी की आयु लगभग दो अरब वर्ष सिद्ध हुई है और वैज्ञानिकों को अपनी पूर्व मान्यताओं को बदलना पड़ रहा है।

   वैज्ञानिक मैकब्राइट का कथन है- इस विश्व के परोक्ष में किसी ऐसी सत्ता के होने की पूरी संभावना है जो ज्ञान और इच्छायुक्त हो। डॉ. मर्डेल ने लिखा है- विभिन्न धर्म, सम्प्रदायों में ईश्वर का जैसा चित्रण किया गया है वैसा तो विज्ञान नहीं मानता पर ऐसी संभावना अवश्य है कि अणु जगत् के पीछे कोई चिंतन शक्ति काम कर रही है। इस संभावना के सत्य सिद्ध होने से ईश्वर का अस्तित्व भी प्रामाणित हो सकता है।

लेकिन एक बात तो निश्चित है कि किसी रचना से रचनाकार की पुष्टि होती है। किसी मिट्टी के घड़े को देखकर कुम्हार के अस्तित्व की पुष्टि होती है। इसी प्रकार जगत् को देखकर जगत् नियन्ता की पुष्टि होती है।

   ईश्वर को मानने वालों की दो स्थितियाँ होती हैं, पहली स्थिति ये है कि आर्य समाज ईश्वर के जो गुण हैं, ईश्वर को वैसा ही मानता है। दूसरी स्थिति ये है कि ईश्वर को जैसा हम मानते हैं, जरुरी नहीं कि ईश्वर वैसा हो ! आर्य समाज का दूसरा नियम आस्तिकता को पुष्ट करता है। ईश्वर सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान् व सर्वज्ञ है। सर्वशक्तिमान् होने के कारण दण्ड देने में पूर्ण समर्थ है, वह कर्माध्यक्ष है। जीवमात्र को कर्मफल प्रदान करता है। न्यायकारी है तो यथोचित फल देना उसका स्वभाव है। दयालु है तो सृष्टि के प्रारम्भ में मनुष्य को वेद के रूप में आचार संहिता प्रदान की। यह प्रभु की दयालुता है। 

🕉️🚩आज का वेद मंत्र 🚩🕉️

🌷ओ३म् समुद्रोऽसि नभस्वानार्द्रदानु: शम्भूर्मयोभूरभि मा वाहि स्वाहा मारुतोऽसि मरुतां गण: शम्भूर्मयोभूरभि मा वाहि स्वाहाऽवस्यूरसि दुवस्वाञ्छम्भूर्मयोभूरभि मा वाहि स्वाहा॥ ( यजुर्वेद १८:४५ )

🌷हे ईश्वर, मैं सुख और दुख दोनों में जल की शीतलता की तरह शीतल बना रहूं। मैं मानसिक और शारीरिक रुप से सुदृढ़ रहूं। मैं बुराई को उसकी कली में ही नष्ट करने वाला होऊं। मैं दूसरों के कल्याण के लिए कार्य करूं। मेरा अपनी इंद्रियां पर पूर्ण नियंत्रण हो। मैं अपने व्यक्तिगत हित की बात ना करूं। मैं तुम्हारी राह पर चलकर मोक्ष को प्राप्त करने वाला बनूं। 



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