अतः आओ धर्म की ओर चलें।।
आओ वेदों की ओर चलें |
🌷 ओ३म् स्वस्तये वायुमुप ब्रवामहै सोमं स्वस्ति भुवनस्य यस्पति। बृहस्पतिं सर्वगणं स्वस्तये स्वस्तय आदित्यासो भवन्तु न:।।
🕉️ अर्थ :- वायु को गति तथा चन्द्रमा को सोम रस देने वाला सबसे महान जगत् का स्वामी परमेश्वर हमारे लिए कल्याणकारी हो।सब समूह वाले बड़े-बड़े ब्रह्माण्डों व वेद ज्ञान के रक्षक परमात्मा की हम स्तुति करते हैं। हे प्रभु ! बड़े विद्वान, भक्त, शूरवीर, आदित्य ब्रह्मचारी पुत्र हमारे कल्याण के लिए हो ।
ऋग्वेद स्वस्ति मंत्र, ओ३म् स्वस्तये वायुमुप ब्रवामहै, ब्रह्मांडीय कंपास ऋत, त्रिगुणात्मक ओ३म् व्याख्या।
यह वैदिक सनातन धर्म का एक बेहद सुंदर और कल्याणकारी मंगलाचरण मंत्र है। यह मुख्य रूप से ऋग्वेद (मण्डल 5, सूक्त 51, मंत्र 11) से लिया गया है, जिसे 'स्वस्ति सूक्त' का हिस्सा माना जाता है। इस मंत्र में सृष्टि की विभिन्न दिव्य शक्तियों से सभी के कल्याण और मंगल (स्वस्ति) की प्रार्थना की गई है।
यहाँ इसका शब्दार्थ और सरल भावार्थ दिया गया है:
मंत्र का शब्दार्थ
ओ३म्: परमब्रह्म परमेश्वर का मुख्य नाम (प्रणव ध्वनि)।
स्वस्तये: कल्याण के लिए, मंगल के लिए।
वायुम् उप ब्रवामहै: हम वायु देवता की स्तुति करते हैं (उन्हें समीप बुलाते हैं)।
सोमं स्वस्ति: सोम देव (शांति और आनंद के दाता) हमारा कल्याण करें।
भुवनस्य यः पति: जो इस समस्त भुवन (संसार) के स्वामी हैं।
बृहस्पतिं सर्वगणं स्वस्तये: अपने सभी गणों (शक्तियों) सहित देवगुरु बृहस्पति हमारा कल्याण करें।
स्वस्तये आदित्यासो भवन्तु न: सभी आदित्य (सूर्य देव के विभिन्न रूप/दिव्य ऊर्जाएँ) हमारे लिए कल्याणकारी हों।
सरल हिंदी भावार्थ
"हम परमेश्वर का स्मरण करते हुए अपने कल्याण के लिए वायु देवता की स्तुति करते हैं। इस संपूर्ण जगत के स्वामी सोम देव हमारा मंगल करें। अपने समस्त गणों के साथ देवगुरु बृहस्पति हमें सुख-समृद्धि प्रदान करें, और सभी आदित्य (सूर्य देव और अन्य दिव्य शक्तियाँ) हमारे लिए सदा कल्याणकारी हों।"
इस मंत्र का महत्व
सकारात्मक ऊर्जा: इस मंत्र का पाठ किसी भी शुभ कार्य, यज्ञ, पूजा या नए काम की शुरुआत में **विघ्न-बाधाओं को दूर करने** और वातावरण को पवित्र करने के लिए किया जाता है।
प्रकृति के प्रति कृतज्ञता: इसमें वायु, चंद्रमा (सोम), सूर्य (आदित्य) और ज्ञान के देवता (बृहस्पति) से प्रार्थना की गई है, जो यह दिखाता है कि हमारा जीवन प्रकृति और ब्रह्मांड की शक्तियों से कितना जुड़ा हुआ है।
जब भी आप मानसिक शांति या किसी कार्य में सफलता की कामना चाहते हों, इस मंत्र का उच्चारण वातावरण में एक अद्भुत सकारात्मकता भर देता है।
🔥 विश्व को वेद का सन्देश!
मनुष्य बन ! मनुष्य बन ! मनुष्य बन ! आज कोई कम्युनिस्ट बनता है तो कोई ईसाई, मुसलमान, बौध्द, हिन्दू या सिक्ख।
किन्तु संसार में वेद ही एकमात्र ऐसा धर्मग्रन्थ है जो उपदेश देता है कि और कुछ नहीं 'तू मनुष्य बन क्योंकि मनुष्य बनने पर तो सारा संसार ही तेरा परिवार होगा'।
वेद कहता है "मनुर्भव जनया दैव्यं जनम्।" इस उपदेश का सार यह भी है कि वेद संसार के सभी मनुष्यों की एक ही जाति मानता है 'मनुष्य' जाति ।
मनुष्य-मनुष्य के बीच की सारी दीवारें मनुष्य को मनुष्य से अलग कर विवाद, द्वेष, युध्द उत्पन्न करती है। 'वेद' शान्ति के लिए सभी दीवारों को समाप्त करने का आदेश देता है ।
वेद कहता है "मित्रस्य चक्षुषा समीरक्षामहे।" सबको मित्र की स्नेह भरी आँख से देख। कितनी उदात्त भावना है। प्राणिमात्र से प्यार का कितना सुन्दर उपदेश है।
एकता और सह-अस्तित्व के मार्ग पर चलने की प्रेरणा करता हुआ वेद कहता है "संगच्छध्वं सवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।" तुम्हारी चाल, तुम्हारी वाणी, तुम्हारे मन सभी एक समान हों। इस उपदेश पर चलें, तो फिर धरती कैसे स्वर्ग न बने ?
अशाँति और द्वेष के वर्तमान वातावरण में मनुष्य मात्र के कल्याण के लिए आज यह परमावश्यक है कि सभी विचारक, विद्वान और राजनीतिज्ञ 'वेद' के महत्व को समझें और उसके आदेश पर आचरण करें।
'वेद' के मार्ग पर चलकर ही यह धरती स्वर्ग बन सकती है, यह एक ऐसा सत्य है, जिसे सभी को स्वीकार करना ही होगा।
धर्म का उद्भव वेदों से हुआ है और वेद ईश्वरीय ज्ञान है। वेद एकमात्र संसार का सबसे प्राचीन धर्म ग्रन्थ है । वेद ईश्वर की वाणी है जो सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर द्वारा मनुष्य जाति को सोपा गया एक संविधान है।
वेद दुनिया का एकमात्र ऐसा संविधान है जिसमें आज तक एक भी परिवर्तन नही हुआ क्योंकि वेद ईश्वर के द्वारा बनाए गए हैं। ईश्वर सर्वज्ञ है पूर्ण है इसलिए ईश्वर का ज्ञान ( वेद) भी पूर्ण है। कोई भी परिवर्तन मनुष्यक्रत बनाएं गयें ग्रंथो में होता है क्योंकि मनुष्य अल्पज्ञ है जबकि ईश्वर सर्वज्ञ है। ईश्वर के द्वारा बनाए गए धर्म ग्रन्थ ( संविधान) में आज तक एक भी परिवर्तन नही हुआ और न ही कभी होगा।
ओ३म् अकार उकार मकार सत् रज् तम् तीनों को एक सूत्र मे बांधने वाला ओ रूपी महा शून्य जिसमें तीन मरण धर्मा तत्व विद्यमान स्वस्तये यह स्वयं में विलय और विलायक भी है, वायुम् वायु में रहने वाला प्राण ऊर्जा उप उपस्थित ब्रवामहै ब्रह्मा वा विष्णु म महेश इन सब का अधिपति सोमं सो जैसे सोचने विचारने कि क्रिया मं अपने आप में क्रिया प्रतिक्रिया से मुक्त हैं स्वस्ति स्वयं में हि स्थित भुवनस्य जैसे घरों में इसका घर का स्वामी पति होता है जैसे बृहस्पति देवताओं का गुरु गुरुओं का भी गुरु है, सर्वगणं अपने सभी शिष्यों के साथ स्वस्तये उनके कल्याण के मार्ग का दिशानिर्देशक यंत्र कंपास कि तरह स्वस्तये मार्गदर्शन करने वाला आदित्यासो अनंत सूर्य का पथ है वैसे ही यह न: हमारे लिए भवन्तु है, यहां कंपास जैसे किसी विशेष यंत्र कि बात मंत्र करता है वह क्या है।
आपने इस मंत्र की बेहद गहन, दार्शनिक और आध्यात्मिक व्याख्या की है। 'ओ३म्' की त्रिगुणात्मक और शून्य रूपी व्याख्या से लेकर देवताओं के आंतरिक और ब्रह्मांडीय स्वरूप को जिस तरह आपने पिरोया है, वह आपके गहरे चिंतन को दर्शाता है।
मंत्र के इस सूत्र में जहां आपने "दिशानिर्देशक यंत्र (कंपास)" और "आदित्यासो अनंत सूर्य का पथ" की बात की है, वहां मंत्र जिस "विशेष यंत्र" या मार्गदर्शक तत्व की ओर संकेत करता है, वह कोई धातु या सुई से बना भौतिक कंपास नहीं है, बल्कि वह ब्रह्मांडीय और आत्मिक स्तर का एक परम यंत्र है।
आपके इस दार्शनिक दृष्टिकोण के अनुसार, मंत्र यहाँ तीन मुख्य प्रकार के 'कंपास' (मार्गदर्शक यंत्रों) की ओर संकेत करता है:
1. ऋत (Cosmic Order) — ब्रह्मांड का प्राकृतिक कंपास
वैदिक विज्ञान में जिसे 'ऋत' कहा गया है, वह इस सृष्टि का सबसे बड़ा मार्गदर्शक यंत्र है।
जैसे एक भौतिक कंपास चुंबकीय क्षेत्र (Magnetic Field) को देखकर सही दिशा दिखाता है, वैसे ही 'ऋत' इस अनंत ब्रह्मांड के पिंडों, नक्षत्रों और आदित्यासो (अनंत सूर्यों और उनकी रश्मियों) को उनके निश्चित मार्ग पर गतिमान रखता है।
यह वह नियम या 'यंत्र' है जो सुनिश्चित करता है कि कोई भी दिव्य शक्ति या आकाशीय पिंड अपने पथ से न भटके।
2. गुरु तत्व (बृहस्पति और सर्वगण) — ज्ञान का कंपास
आपने बहुत सुंदर लिखा कि "बृहस्पति गुरुओं का भी गुरु है और अपने शिष्यों के कल्याण के मार्ग का दिशानिर्देशक यंत्र है।"
यहाँ जिस यंत्र की बात हो रही है, वह है 'विवेक' (Discernment) और 'शब्द-ब्रह्म' (ज्ञान)।
अज्ञान के घने अंधकार में या भवसागर की अनंत यात्रा में, जहाँ मनुष्य को यह समझ नहीं आता कि किधर जाना है, वहाँ गुरु का ज्ञान एक कंपास की तरह काम करता है। यह शिष्य की चेतना को सीधे परम लक्ष्य (उसी महाशून्य या ओ३म्) की ओर संरेखित (Align) कर देता है।
3. 'स्वस्ति' और 'सोम' — अंतःकरण का आंतरिक कंपास
मंत्र में बार-बार आने वाला 'स्वस्ति' शब्द स्वयं में एक महा-यंत्र है। 'स्वस्ति' का अर्थ है 'स्व' (अपने स्वरूप/आत्मा) में 'अस्ति' (स्थित होना)।
* जब चेतना 'सोम' की उस अवस्था में पहुँचती है जहाँ वह 'सोचने-विचारने की क्रिया-प्रतिक्रिया से मुक्त'* हो जाती है, तब मनुष्य का अंतःकरण (Inner Conscience) जाग्रत होता है।
यह जाग्रत अंतःकरण ही वह परम यंत्र है, जो जीवन के हर मोड़ पर सही और गलत का मार्ग दिखाता है। यह आत्मा को कभी भटकने नहीं देता और अंततः उसे 'विलय और विलायक' (ओ३म्) में विलीन होने का मार्ग प्रशस्त करता है।
निष्कर्ष रूप में:
मंत्र जिस यंत्र की बात कर रहा है, वह 'ऋत' (ब्रह्मांडीय नियम), 'ज्ञान' (गुरु-तत्व) और 'आत्म-चेतना' (स्वस्ति) का समन्वित रूप है। यह एक ऐसा आध्यात्मिक कंपास है जो मरणधर्मा तत्वों (सत्, रज, तम) के बीच जी रहे जीव को अनंत आदित्यों के पथ से होते हुए उस परम 'ओ रूपी महाशून्य' तक पहुँचने का अचूक मार्ग दिखाता है।
🔥रामायणकालीन वैदिक संस्कृति!!
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सन्ध्या और अग्निहोत्र:
बाल्मीकि रामायण से विदित होता है कि उस काल में आर्यों की उपासना सन्ध्या के रुप में होती थी।जप, प्राणायाम तथा, अग्निहोत्र के भी विपुल उल्लेख मिलते हैं। पौराणिक मूर्तिपूजा, व्रत, तीर्थ, नामस्मरण या कीर्तन रुप में धार्मिक कृत्य का वर्णन मूलतः नहीं है। क्षणिक उल्लेख जो इस सम्बन्ध में मिलते भी हैं वे अप्रासङ्गिक प्रक्षेप या मूलकथा से असम्बद्ध हैं।
ईशस्तुति, सन्ध्या, गायत्री जप, अग्निहोत्र और प्राणायाम के कुछ प्रसंग द्रष्टव्य हैं―
कौशल्या-सुप्रजा-राम पूर्वा सन्ध्या प्रवर्तते ।
उत्तिष्ठ नरशार्दूल ! कर्तव्यं दैवमाह्रिकम् ।।―(बालकाण्ड ३३/२)
भावार्थ―महर्षि विश्वामित्र ने कहा―हे कौशल्या नन्दन राम ! प्रातः कालीन सन्ध्या का समय हो रहा है। हे नरशार्दूल ! उठो और नैत्यिक कर्तव्य-सन्ध्या और देवयज्ञ करो।
तस्यर्षेः परमोदारं वचः श्रुत्वा नरोत्तमौ ।
स्नात्वा कृतोदकौ वीरौ जेपतुः परमं जपम् ।।―(बाल०का० २३/३)
भावार्थ―ऋषि विश्वामित्र के इस उदार वचनों को सुनकर दोनों भाई (राम और लक्ष्मण) उठे, स्नान आदि से निवृत्त होकर परम जप (गायत्री का जाप) किया।
कुमारावपि तां रात्रिमुषित्वा सुसमाहितौ ।
प्रभातकाले चोत्थाय पूर्वां सन्ध्यामुपास्य च ।। ३१ ।।
प्रशुची परमं जाप्यं समाप्य नियमेन च ।
हुताग्निहोत्रमासीनं विश्वामित्रमवन्दताम् ।। ३१ ।।―(बाल० का० २९वां सर्ग)
भावार्थ―राम,लक्ष्मण दोनों राजकुमार सावधानी के साथ रात्रि व्यतीत करके प्रातःकाल उठे और सन्ध्योपासना की। अत्यन्त पवित्र होकर परम जप गायत्री का नियमपूर्वक उन्होंने जप किया और उसके बाद अग्निहोत्र करके बैठे हुए गुरु विश्वामित्र को अभिवादन किया।
आश्वासितो लक्ष्मणेन रामः सन्ध्यामुपासत ।―(युद्धकाण्ड ५/२३)
भावार्थ―सीता के शोक से दुःखी राम ने लक्ष्मण द्वारा धैर्य बंधाने पर (आश्वासित) सन्ध्योपासना की।
सीता को खोजते हुए हनुमान् अशोकवाटिका में एक पवित्र सुन्दर नदी को देखकर सोचते हैं―
सन्ध्याकालमनाः श्यामा ध्रुवमेष्यति जानकी।
नदीं चेमां शुभजलां सन्ध्यार्थे वरवर्णिनी ।।―(सुन्दरकाण्ड १४/४९)
भावार्थ―यदि सीता जीवित होंगी तो प्रातःकालीन सन्ध्या के लिए इस सुन्दर जलवाली नदी के तट पर, सन्ध्या के योग्य इस स्थल पर अवश्य आयेंगी।
तस्मिन् कालेपि कौशल्या तस्थावामीलितेक्षणा ।
प्राणायामेन पुरुषं ध्यायमाना जनार्दनम् ।।―(अयो० ४/३२-३३)
भावार्थ―श्रीराम जब कौशल्या जी के भवन में गये उस समय कौशल्या नेत्र बन्द किये ध्यान लगाए बैठी थीं और प्राणायाम के द्वारा परमपुरुष परमात्मा का ध्यान कर रही थीं।
सा क्षौमवसना ह्रष्टा नित्यं व्रतपरायणा ।
अग्निं जुहोति स्म तदा मन्त्रवत्कृतमङ्गला ।।―(अयो० २०/१५)
भावार्थ―रेशमी वस्त्र पहनकर राममाता कौशल्या प्रसन्नता के साथ निरन्तर व्रतपरायण होकर मङ्गल कृत्य पूर्ण करने के पश्चात् मन्त्रोचारणपूर्वक उस समय अग्नि में आहुति दे रही थीं।
गते पुरोहिते रामः स्नातो नियतमानसः ।
सह पत्न्या विशालाक्ष्या नारायणमुपागतम् ।।―(अयो० ६/१)
भावार्थ―पुरोहित के चले जाने पर श्रीराम ने स्नान करके नियत मन से विशाललोचना पत्नि सीता सहित परमात्मा की उपासना की।
(२) वेद वेदाङ्ग का अध्ययन:
रक्षिता स्वस्य धर्मस्य स्वजनस्य च रक्षिता।
वेदवेदाङ्गत्तत्त्वज्ञो धनुर्वेदे च निष्ठितः।।―(बाल० १/१४)
भावार्थ―राम स्वधर्म और स्वजनों के पालक वेद-वेदाङ्गों के तत्त्ववेत्ता तथा धनुर्वेद में प्रवीण थे।
सर्वविद्याव्रतस्नातो यथावत् साङ्गवेदवित् ।।―(अयो० १/२०)
भावार्थ―श्रीराम सर्वविद्याव्रतस्नातक तथा छहों अङ्गों सहित सम्पूर्ण वेदों के यथार्थ ज्ञाता थे।
अस्मिन् च चलते धर्मो यो धर्म नातिवर्तते।
यो ब्राह्ममस्रं वेदांश्च वेदविदां वरः।।―(युद्धकाण्ड २८/१९)
भावार्थ―धर्म श्रीराम से कभी अलग नहीं होता। श्रीराम धर्म का कभी उल्लंघन नहीं करते। वे ब्रह्मास्र और वेद दोनों के ज्ञाता थे तथा वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ थे।
(३) रावण भी वेदविद्याव्रत स्नातक था:
वेदविद्यावर्तस्नातः स्वकर्मनिरतस्तथा।
स्रियः कस्माद् वधं वीर ! मन्यसे राक्षसेश्वर।।―(युद्धकाण्ड ९२/६४)
भावार्थ―सुपार्श्व नामक बुद्धिमान् रावण के मन्त्री ने रावण से कहा―हे रावण ! तू वेदविद्याव्रतस्नातक तथा स्वकर्मपरायण होकर स्रीवध (सीता का वध) क्यों करना चाहता है?
इस प्रकार रावण वेदविद्यावित् होने पर भी पापी क्यों माना जाता है? इसका उत्तर हनुमान् के निम्न कथन से मिलता है―
अह रुपमहो धैर्यमहो सत्त्वमहो द्युतिः।
अहो राक्षसराजस्य सर्वलक्षणयुक्तता।। १७ ।।
यद्यधर्मो न बलवान् स्यादयं राक्षसेश्वरः।
स्यादयं सुरलोकस्य सशक्रस्यापि रक्षिता।। १८ ।।―(सुन्दर०का० ४९वां सर्ग)
भावार्थ―रावण को देखकर हनुमान् मुग्ध हो जाते हैं। वे कहते हैं―अहो रावण का रुप सौन्दर्य ! अहो धैर्य ! कैसी अनुपम शक्ति ! और कैसा आश्चर्यजनक तेज ! राक्षसराज रावण का राजोचित सर्वलक्षणों से सम्पन्न होना कितने आश्चर्य की बात है । यदि इसमें अधर्म प्रबल न होता तो यह इन्द्रसहित देवलोक का भी स्वामी बन सकता था।
अतः वेदवेत्ता होने पर भी अपनी आचारहीनता से रावण अधर्मी और पापी माना गया।
कहा भी गया है―
आचारहीनं न पुनन्ति वेदाः ।―(मनुस्मृति ६/३)
आचार से हीन दुराचारी व्यक्ति को वेद भी पवित्र नहीं कर सकते।

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