🔥ईश्वर भक्ति में आने वाली बाधाएँ व वैदिक धर्म की अन्य मतों से तुलना।
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प्रश्न १ :-ईश्वर भक्ति के रास्ते में कौन-२ सी बाधाएँ हैं,जिनको पार कर हम इस मार्ग में अग्रसर हो सकते हैं?
उत्तर:- योग दर्शन में विस्तार से उन बाधाओं का वर्णन किया गया है।जिनमें से पाँच मुख्य है जिनसे बचना अत्यन्तावश्यक है।
प्रथम कारण - ईश्वर भक्ति में दृढ़ विश्वास का न होना अर्थात् मन में संशय का होना यथा ईश्वर है कि नहीं,भक्ति से कोई लाभ होगा की नहीं इत्यादि संशय जब तक मन में है,भक्ति की और बढ़ना कठिन है।
दूसरा कारण - विषयों का सेवन तथा राग,रंग,सिनेमा,थियेटर का आकर्षण है,इनसे ब्रह्मचर्य का नाश होता है और भक्ति में मन स्थिर नहीं होता।
तीसरा कारण - शरीर का निर्बल वा रुग्ण होना अथवा स्वास्थय का ठीक न होना है।धर्म और भक्ति का सिद्ध करने वाला सर्वोत्तम साधन शरीर है।इसकी कभी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।
चौथा कारण - अनियमितता है-अर्थात् कभी ध्यान में बैठना कभी न बैठना,अतः नियमपूर्वक,दीर्घकाल तक तथा श्रद्धा के साथ भक्ति करना आवश्यक है।
पाँचवां कारण - अभिमान का होना है।ईश्वर भक्ति में किसी प्रकार का भी अभिमान सबसे बड़ी बाधा है।क्योंकि अभिमान किसी प्रकार भी भगवान् को नहीं भाता।
प्रश्न 2:- अन्य मतों से वैदिक भक्ति की विशेषतायें क्या हैं?
उत्तर:-(१) वैदिक भक्ति में एक ईश्वर के अतिरिक्त किसी दूसरे पीर,फकीर,पैगम्बर, साधू, ,सन्त महात्मा,ऋषि,मुनि,सिद्ध,अवतार का कोई महत्व नहीं है। ईश्वर से सीधा सम्बन्ध है।
अन्य मतों में ईश्वर के साथ मत प्रवर्तकों को भी सम्मिलित माना गया है।
यथा मुसलमान कहते हैं-
अल्लाह के पल्ले में वहदत के सिवा क्या है।
जो लेना है ले लेंगे हम अपने मुहम्मद से।
(२) दूसरे वैदिक भक्ति में कर्त्तव्य कर्मों पर बल दिया गया है,दूसरे मतों में कर्त्तव्य कर्मों की उपेक्षा की गई हैं।और संसार से भागकर भाग्य भरोसे जीने का उपदेश दिया गया है-
अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम ।
दास मलूका कह गये सबके दाता राम ।
(३) तीसरे वैदिक भक्ति में जैसा करो वैसा भरो का सिद्धान्त है अतः पापों से बचने पर बल दिया गया है।अन्य मतों में ईश्वर पाप क्षमा करने वाला है अतः जी भरकर पाप करो पुनः तौबा कर लो का सिद्धान्त है।कहा भी है-
रात को मय कशी सुबह को तौबा कर ली ।
रिन्द के रिन्द रहे हाथ से जन्नत न गई ।
(४) चौथे वैदिक भक्ति में विश्व के कल्याण की भावना है अन्य मतों में अपने तथा अपने ही मतवालों के कल्याण की स्वार्थ भावना है।यथा मतवादी अपने ही मतवालों का भला चाहते हैं परन्तु वैदिक धर्मी-सबका भला करो भगवान,सब ही देखें हित कल्याण,की प्रार्थना करता है।
(५) पाँचवे वैदिक भक्ति में श्रद्धा और विश्वास के साथ-२ बुद्धि और तर्क की प्रधानता है अन्य मतों में अन्धविश्वास और विवेक शून्यता की प्रधानता है।
(६) छठे वैदिक भक्ति में अदीनास्याम अर्थात् हम कभी दीन हीन और मोहताज न हों की भावना है और अन्य मतों में आत्महीनता की भावना भरी है यथा "मैं मूर्ख खल कामी कृपा करो भर्त्ता" इत्यादि।
(७) सातवें वैदिक भक्ति में ईश्वर को भक्त अपना नित्य प्रति हिसाब देता है अन्य मतों में भक्त ईश्वर से हिसाब लेता है और कहता है कि तूने यह नहीं किया वह नहीं किया,यह नहीं दिया वह नहीं दिया इत्यादि।
अतः वैदिक भक्ति ही सर्वोत्तम तथा सर्वश्रेष्ठ है।
आओ लौटें वेदों की ओर ।
🕉️🚩 परिश्रमेव जयते 🕉️🚩
🌷पुरुषेणेह हातव्या भूतमिच्छिता। निंद्रा तंद्रा भयं क्रोध: आलस्यं दीर्घसूत्रता।। ( विदुर नीति)
💐अर्थ:- इस दुनिया में ऐश्वर्य चाहने वालों को छ: चीजों का त्याग कर देना चाहिए - निंद्रा (ज्यादा नींद), तंद्रा (अनुत्साह, झपकी), भय (डर), क्रोध (रोष, खीझ), आलस्य (सुस्ती) और दीर्घसूत्रता (कोई कार्य शुरू करने में अनावश्यक और अतिशय विलंब करना)
🔥ज्योतिष विद्या, ग्रह पूजा व वास्तु शास्त्र बनाम मनुष्य की समस्याएँ
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प्रत्येक मनुष्य के जीवन में समस्याओं का आना स्वाभाविक है। इनका श्रोत काम , क्रोध, लोभ, मोह , ईर्ष्या , द्वेष ,अहंकार के साथ साथ मनुष्य के पूर्व जन्म के कर्मों का नकारात्मक फल और पुण्य की कमी होना है । इनका प्रभाव हर जीवात्मा पर किसी ना किसी रूप में - सीमित अथवा असीमित मात्रा में - केवल कुछ समय तक पड़ता है जैसे आमदनी , रोज़गार ना होना , बीमारी, मानसिक तनाव आदि आदि होना ।
इन समस्याओं का चिंतन करके उनका हल निकालने में बुद्धिमत्ता है ना कि ज्योतिष , वास्तु शास्त्र आदि पर निर्भर होकर समय व पैसा बर्बाद करना ।
वेदों के अनुसार उपरोक्त किसी भी समस्या का समाधान ज्योतिष में कदापि नहीं है । मूर्ति पूजा , ग्रह पूजा , नक्षत्र पूजा , शनि पूजा , वास्तु शास्त्र , लाल किताब के उपाय आदि में भी नहीं है । तीर्थ स्थानों में जाकर पूजा करना व दान देना भी समस्या का समाधान नहीं है ।
ज्योतिषी व पंडित लोग मनुष्यों की आध्यात्मिक अज्ञानता , मानसिक कमज़ोरी और विपरीत परिस्थितियों का अनुचित लाभ उठाकर उनका आर्थिक शोषण करते हैं। उनसे ऐसी क्रियाओं करवाते हैं।और खूब धन ऐठते है । ऐसी प्रथा / उपाय विदेशों में अथवा कुछ अन्य वर्गों में प्रचलित नहीं हैं।
💐🙏 आज का वेद मंत्र 💐🙏
🌷 ओ३म् स्वस्ति पन्थामनुचरेम सूर्याचन्द्रमसाविव। पुनर्ददताध्नता जानता सं गमेमहि ।( ऋग्वेद ५|५१| १५)
💐 अर्थ :- हम सूर्य और चन्द्रमा की भांति कल्याण- युक्त मार्ग पर चलते रहें। दानी, अहिंसा कारी, ज्ञानी जनों तथा परमात्मा से हम मेल कर सदा सुख प्राप्त करें ।

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