Time and Consumption: Vairagya

वैराग्यशतकम् - श्लोक ७ (सापेक्षता का अनुसंधान)

भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ताः
तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः ।
कालो न यातो वयमेव याता-
स्तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः ॥ ७॥
संस्कृत शब्द विच्छेद / प्रकृति-प्रत्यय अर्थ (Deep Meaning)
भुक्ताः भुज् + क्त (कर्मणि) भोगे गए / समाप्त किए गए (Consumed)।
तप्ताः तप् + क्त तप गए / जल गए (Burnt out)।
याताः या + क्त चले गए / बीत गए (Gone/Expired)।
जीर्णाः जॄ + क्त बूढ़े हो गए / जर्जर हो गए (Decayed)।

हिन्दी: हमने भोगों को नहीं भोगा, बल्कि भोगों ने ही हमें भोग लिया (हमें नष्ट कर दिया)। हमने तप नहीं किया, बल्कि हम स्वयं ही संतापों में तप गए। समय नहीं बीता, बल्कि हम स्वयं ही बीत गए (समाप्त हो गए)। तृष्णा बूढ़ी नहीं हुई, बल्कि हम स्वयं ही बूढ़े हो गए।


English: We did not enjoy the worldly pleasures, rather the pleasures consumed us. We did not perform penance, rather we ourselves got burnt by anxieties. Time did not pass, rather we ourselves passed away. Desires did not age, rather we ourselves have become aged and decayed.

1. The Concept of Relativity (कालो न यातो वयमेव याताः): भौतिकी (Physics) में समय एक 'Constant' की तरह व्यवहार करता है, लेकिन जैविक रूप से हम 'Entropy' के अधीन हैं। समय तो अपनी गति से चल रहा है, लेकिन हमारी कोशिकाएं (Cells) नष्ट हो रही हैं। हम कहते हैं "समय बीत गया", जबकि सत्य यह है कि समय स्थिर है, हमारा 'जीवन-काल' कम हो रहा है।

2. Biological Feedback Loop (भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ताः): जीवविज्ञान के अनुसार, प्रत्येक 'भोग' (Pleasure) शरीर की ऊर्जा और अंगों का क्षय करता है। अत्यधिक इन्द्रिय सुख हमारे 'Telomeres' (DNA के सिरे) को छोटा करते हैं, जिससे बुढ़ापा जल्दी आता है। हम जिसे 'उपभोग' समझ रहे हैं, वह दरअसल हमारे शरीर का 'Auto-consumption' है।

3. The Immortal Desire (तृष्णा न जीर्णा): मनोविज्ञान (Psychology) में इसे 'Hedonic Adaptation' कहते हैं। शरीर बूढ़ा होकर शिथिल हो जाता है, पर मस्तिष्क का 'Desire Center' (तृष्णा) कभी बूढ़ा नहीं होता। यह एक घातक विरोधाभास है जहाँ 'Software' (तृष्णा) अभी भी नया है, पर 'Hardware' (शरीर) जर्जर हो चुका है।

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