👉 ऐसी हो गुरु में निष्ठा:-
प्राचीनकाल में गोदावरी नदी के किनारे वेदधर्म मुनि के आश्रम में उनके शिष्य वेद-शास्त्रादि का अध्ययन करते थे। एक दिन गुरु ने अपने शिष्यों की गुरुभक्ति की परीक्षा लेने का विचार किया। सत्शिष्यों में गुरु के प्रति इतनी अटूट श्रद्धा होती है कि उस श्रद्धा को नापने के लिए गुरुओं को कभी-कभी योगबल का भी उपयोग करना पड़ता है।
वेदधर्म मुनि ने शिष्यों से कहाः "हे शिष्यो ! अब प्रारब्धवश मुझे कोढ़ निकलेगा, मैं अंधा हो जाऊँगा इसलिए काशी में जाकर रहूँगा। है कोई हरि का लाल, जो मेरे साथ रहकर सेवा करने के लिए तैयार हो?" शिष्य पहले तो कहा करते थेः ʹगुरुदेव ! आपके चरणों में हमारा जीवन न्योछावर हो जाय मेरे प्रभु!ʹअब सब चुप हो गये।
उनमें संदीपक नाम का शिष्य खूब गुरु सेवापरायण, गुरुभक्त था। उसने कहाः "गुरुदेव! यह दास आपकी सेवा में रहेगा।" गुरुदेवः "इक्कीस वर्ष तक सेवा के लिए रहना होगा।" संदीपकः "इक्कीस वर्ष तो क्या मेरा पूरा जीवन ही अर्पित है। गुरुसेवा में ही इस जीवन की सार्थकता है।"
वेदधर्म मुनि एवं संदीपक काशी में मणिकर्णिका घाट से कुछ दूर रहने लगे। कुछ दिन बाद गुरु के पूरे शरीर में कोढ़ निकला और अंधत्व भी आ गया। शरीर कुरूप और स्वभाव चिड़चिड़ा हो गया। संदीपक के मन में लेशमात्र भी क्षोभ नहीं हुआ।
वह दिन रात गुरु जी की सेवा में तत्पर रहने लगा। वह कोढ़ के घावों को धोता, साफ, करता, दवाई लगाता, गुरु को नहलाता, कपड़े धोता, आँगन बुहारता, भिक्षा माँगकर लाता और गुरुजी को भोजन कराता। गुरुजी गाली देते, डाँटते, तमाचा मार देते, डंडे से मारपीट करते और विविध प्रकार से परीक्षा लेते किंतु संदीपक की गुरुसेवा में तत्परता व गुरु के प्रति भक्तिभाव अधिकाधिक गहरा और प्रगाढ़ होता गया।
काशी के अधिष्ठाता देव भगवान विश्वनाथ संदीपक के समक्ष प्रकट हो गये और बोलेः "तेरी गुरुभक्ति एवं गुरुसेवा देखकर हम प्रसन्न हैं। जो गुरु की सेवा करता है वह मानो मेरी ही सेवा करता है। जो गुरु को संतुष्ट करता है वह मुझे ही संतुष्ट करता है।
बेटा ! कुछ वरदान माँग ले।" संदीपक गुरु से आज्ञा लेने गया और बोलाः।"शिवजी वरदान देना चाहते हैं आप आज्ञा दें तो वरदान माँग लूँ कि आपका रोग एवं अंधेपन का प्रारब्ध समाप्त हो जाय।" गुरु ने डाँटाः "वरदान इसलिए माँगता है कि मैं अच्छा हो जाऊँ और सेवा से तेरी जान छूटे! अरे मूर्ख! मेरा कर्म कभी-न-कभी तो मुझे भोगना ही पड़ेगा।" संदीपक ने शिवजी को वरदान के लिए मना कर दिया।।शिवजी आश्चर्यचकित हो गये कि कैसा निष्ठावान शिष्य है!
शिवजी गये विष्णुलोक में और भगवान विष्णु से सारा वृत्तान्त कहा। विष्णु भी संतुष्ट हो संदीपक के पास वरदान देने प्रकटे। संदीपक ने कहाः "प्रभु ! मुझे कुछ नहीं चाहिए। "भगवान ने आग्रह किया तो बोलाः "आप मुझे यही वरदान दें कि गुरु में मेरी अटल श्रद्धा बनी रहे।
गुरुदेव की सेवा में निरंतर प्रीति रहे,। गुरुचरणों में दिन प्रतिदिन भक्ति दृढ़ होती रहे। "भगवान विष्णु ने संदीपक को गले लगा लिया। संदीपक ने जाकर देखा तो वेदधर्म मुनि स्वस्थ बैठे थे। न कोढ़, न कोई अँधापन!
शिवस्वरूप सदगुरु ने संदीपक को अपनी तात्त्विक दृष्टि एवं उपदेश से पूर्णत्व में प्रतिष्ठित कर दिया। वे बोलेः "वत्स ! धन्य है तेरी निष्ठा और सेवा ! पुत्र ! तुम धन्य हो ! तुम सच्चिदानंद स्वरूप हो।" गुरु के संतोष से संदीपक गुरु-तत्त्व में जग गया, गुरुस्वरूप हो गया।
अपनी श्रद्धा को कभी भी, कैसी भी परिस्थिति में सदगुरु पर से तनिक भी कम नहीं करना चाहिए। वे परीक्षा लेने के लिए कैसी भी लीला कर सकते हैं। गुरु आत्मा में अचल होते हैं, स्वरूप में अचल होते हैं। जो हमको संसार-सागर से तारकर परमात्मा में मिला दें, जिनका एक हाथ परमात्मा में हो और दूसरा हाथ जीव की परिस्थितियों में हो, उऩ महापुरुषों का नाम सदगुरु है।
सदगुरु मेरा सूरमा, करे शब्द की चोट।
मारे गोला प्रेम का, हरे भरम की कोट।।
गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूँ पाये।
बलिहारी गुरु आपने, गोविन्द दियो बताय।।
🔥अष्टांग योग का अभ्यास।
अष्टांग योग अध्यात्म के नवप्रवेशी साधकों के लिए बडा ही उपयोगी व सरल है। यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि ये योग के आठ अंग हैं। इसे अष्टांग योग या राजयोग भी कहा जाता है। यम के अंतर्गत साधक को अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह का अभ्यास करना होता है। मन, वाणी और शरीर से किसी प्राणी को दुःख न देना ही अहिंसा है। अहिंसा के अभ्यास से व्यक्ति में दूसरों के प्रति हिंसा, वैर-भाव आदि समाप्त हो जाते हैं। जो व्यक्ति परमपिता परमेश्वर का प्यार पाना चाहता है, भला वह स्वयं हिंसक कैसे हो सकता है? वह भी तो सबके प्रति प्रेम से भरा होना चाहिए।
सत्य का अर्थ है- मिथ्या वचन का परित्याग। व्यक्ति को वैसे वचनों का प्रयोग करना चाहिए, जिनसे सभी प्राणियों का हित हो। अस्तेय तीसरा यम है। दूसरे के धन का अपहरण करने की प्रवृत्ति का त्याग ही अस्तेय है। ब्रह्मचर्य चौथा यम है। ब्रह्मचर्य का अर्थ है विषय-वासना की ओर झुकाने वाली प्रवृत्ति का परित्याग। अपरिग्रह पांचवां यम है। लोभ वश वस्तुओं का संग्रह करते रहने की प्रवृत्ति का त्याग ही अपरिग्रह है। नियम - योग का दूसरा अंग है। नियम भी पांच हैं। शौच प्रथम नियम है। शौच के अंदर बाह्य और आंतरिक शुद्धि समाविष्ट है। नित्य स्नान, पवित्र सात्विक भोजन, स्वच्छता के द्वारा बाह्य शुद्धि तथा मैत्री, करुणा, सहानुभूति, प्रसन्नता, कृतज्ञता के द्वारा आंतरिक अर्थात मानसिक शुद्धि को अपनाना चाहिए। संतोष दूसरा नियम है। उचित प्रयास से जो कुछ भी प्राप्त हो उसी से संतुष्ट रहना ही संतोष कहलाता है। तप तीसरा नियम है। सरदी-गरमी सहने की शक्ति, लगातार बैठे रहना, खडा रहना, शारीरिक कठिनाइयों को झेलना आदि को ही तप कहा गया है। स्वाध्याय चौथा नियम है। स्वाध्याय का अर्थ है- स्वयं का अध्ययन करना, आत्मनिरीक्षण, आत्ममूल्यांकन, शास्त्रों का अध्ययन, बुद्धपुरुषों के कथनों का अनुशीलन आदि करना। ईश्वरप्रणिधान पांचवां नियम है। ईश्वर के प्रति श्रद्धा-विश्वास रखना ही ईश्वरप्रणिधान है।
यम-नियम का पालन करता हुआ साधक अब अष्टांग योग के तीसरे अंग का अभ्यास करता है, जिसे आसन कहते हैं। आसन का अर्थ है शरीर को विशेष रूप से स्थिर रखना। पद्मासन, सुखासन, सिद्धासन, स्वस्तिकासन आदि किसी आसन में सुखपूर्वक एवं स्थिरता पूर्वक बैठने से मन की चंचलता मिटने लगती है। चतुर्थ अंग को प्राणायाम कहते हैं। श्वास-प्रश्वास की क्रिया के द्वारा जीवन शक्ति में वृद्धि होती है, मन की चंचलता एवं अज्ञानता भी मिटने लगती है। प्रत्याहार पांचवां अंग है। इसके द्वारा इंद्रियों को बाह्य विषयों से हटाना तथा उन्हें मन के वश में रखना होता है।
धारणा योग का छटा अंग है। धारणा का अर्थ है चित्त को अभीष्ट विषय पर जमाना, लगाना या एकाग्र करना। धारणा से चित्त किसी एक विषयवस्तु पर केंद्रित हो जाता है। वह वस्तु बाह्य या आंतरिक, दोनों ही हो सकती हैं। इस अवस्था की प्राप्ति के बाद साधक ध्यान करने के योग्य हो जाता है।
ध्यान सातवां योग अंग है। चित्त की एकाग्रता जब गहरी होती जाती है तब इसे ध्यान कहते हैं। समाधि आठवां योग अंग है। इस अवस्था में ध्येय वस्तु भी पूर्णतः लीन हो जाती है, जिसके फलस्वरूप उसे अपना कुछ भी ज्ञान नहीं रहता है।
ध्यान की अवस्था में वस्तु की ध्यान क्रिया और आत्मा की चेतना रहती है, परंतु समाधि में यह चेतना ध्येय स्वरूप मात्र रहती है। इस अवस्था में चित्त की वृत्तियों का निरोध हो जाता है। इस प्रकार अंततः साधक का अंतरंग आत्मज्ञान व ब्रह्मज्ञान की ज्योति में जगमगा उठता है, ज्योतिर्मय हो उठता है।
समाधि की पराकाष्ठा में उसे अपने वास्तविक स्वरूप का बोध हो जाता है। चित्त के निर्मल होते ही, पावन होते ही उस पर ईश्वरीय अनुदान, अनुग्रह बरसने लगते हैं। उसके अंदर करुणा, संवेदना, प्रेम के अजस्त्र स्तोत्र फूट पडते हैं। उसके अंतस् के आकाश में एक ओर ज्ञान का सूर्य उग आता है तो दूसरी ओर उसका आत्मविस्तार होते ही उसके हृदयसिंधु में प्रेम की अनगिनत लहरें उठने लगती हैं और वह उन लहरों में खेलता हुआ, किलकारियां भरता हुआ सदा आनंदित होता रहता है। इस प्रयोग को हमें स्वयं के जीवन में भी करके देखना चाहिए।
🌷ओ३म् वेदोसि येनं त्वं देव वेद देवेभ्यो वेदो भवस्तेन मह्यं वेदो भूयाः । देवा गातुविदो गातुं वित्त्वा गातुमित । मनसस्पत इमं देव यज्ञँ स्वाहा वाते धाः। ( यजुर्वेद २:२९)
💐 अर्थ :- हे विद्वान मनुष्यो ! तुम लोगों को जिस वेद जाननेवाले परमेश्वर ने वेदविद्या प्रकाशित की है, उसकी उपासना करके उसी वेदविद्या को जानकर और क्रियाकाण्ड का अनुष्ठान करके सबका हित सम्पादन करना चाहिए क्योंकि वेदों के विज्ञान के बिना तथा उसमें जो-जो कहे हुए काम हैं, उनके किये बिना मनुष्यों को कभी सुख नहीं हो सकता । तुम लोग वेदविद्या से जो सबका साक्षी ईश्वर देव है, उसको सब जगह व्यापक मानके नित्य धर्म में रहो ।
स्वस्थ शरीर --घर में रहे तो नंगे पैर, मूत्र त्याग करें बैठ कर ,शौच करें बैठ कर, पेस्ट न करें मंजन अथवा दातुन करें ,एल्युमिनियम का बर्तन का उपयोग न करे शुबह फल अथवा सलाद जैसे गाजर खीरा चुकंदर थोड़ा खाएं रिफाइन ,आयोडीन नमक ,चीनी ,मैदा,जंक फूड, फ़ास्ट फूड ये सभी स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है इनका त्याग करें, गुड़ का उपयोग नियमित करें भोजन कुकर में न बनाये ,जब भी पानी पिये बैठ कर पिये धीरे धीरे पियें कम से कम नियमित 15मिनट अपने पैर पर जोर दे कर वैठे हमारे भाषा में इसे चुका मुक़ा वैठना कहते हैं घर के पास यदि पैर में चुभने का भय न हो तो वहाँ नंगे पैर ही रहे यदि वहा का जमीन गर्म न हो तो शाम का भोजन 7बजे तक करें उसके बाद कुछ भी न खाएं आप यह देख कर हैरान हो जायेगे कि इन नियमों के पालन से आप किसी बीमारी से पीड़ित हैं तो बिना दवाई के ही आप ठीक हो रहे हैं नियमित अपनी दिनचर्या उपरोक्त रख रहे हैं तो आप सदैव स्वस्थ रहेंगे ॐ नमस्ते जी
नमस्कार जय श्री कृष्णा मित्रों आज मैं एक बहुत ही महत्वपूर्ण गंभीर बीमारी पर अपने विचार रखने जा रहा हूं आजकल मैंने देखा है कि हार्ड ब्लॉकेज एक बहुत गंभीर समस्या बन गई है मैं अभी 2 से 3 महीने में हार्ड ब्लॉकेज से हाल फिलहाल में सात आठ नवयुवकों की मृत्यु होते देखा है जो कि हमारे आसपास शहर के ही रहने वाले थे जिनकी उम्र 30 से लेकर 45 साल रही है वह केवल हार्ड ब्लॉकेज से ही छोटी सी जिंदगी में मृत्यु को प्राप्त हो गए तो चलो मैं कुछ ऐसी आयुर्वेदिक औषधीय को बताने जा रहा हूं जिससे इस बीमारी की जटिल समस्याओं को बहुत काम किया जा सकता है
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि “हार्ट ब्लॉकेज” (धमनियों में रुकावट) एक गंभीर स्थिति हो सकती है। अगर छाती में दर्द, सांस फूलना, अत्यधिक पसीना, बायें हाथ या जबड़े में दर्द जैसे लक्षण हों तो तुरंत हृदय रोग विशेषज्ञ से जांच कराएं। आयुर्वेद सहायक हो सकता है, लेकिन आपातकालीन चिकित्सा का विकल्प नहीं है।
आयुर्वेद में हृदय रोग को , जहाँ कफ, मेद (चर्बी), और रक्तवाहिनियों में अवरोध को मुख्य कारण माना गया है।
आयुर्वेदिक सहायक उपाय
1. अर्जुन की छाल
हृदय के लिए आयुर्वेद में अर्जुन को अत्यंत श्रेष्ठ माना गया है।
1 चम्मच अर्जुन छाल चूर्ण
1 कप दूध + 1 कप पानी में पकाएं
आधा रहने पर छानकर सुबह-शाम लें
यह हृदय को बल देने और रक्तसंचार सुधारने में सहायक माना जाता है।
2. लहसुन का सेवन
कच्ची लहसुन की 1–2 कली सुबह गुनगुने पानी के साथ लेने से कोलेस्ट्रॉल और रक्तवाहिनियों की जकड़न कम करने में सहायता मिल सकती है।
3. शुद्ध हींग का प्रयोग
शुद्ध हींग पाचन सुधारकर गैस व वात को कम करती है, जिससे हृदय क्षेत्र पर दबाव कम महसूस हो सकता है।
दाल, सब्जी या छाछ में चुटकी भर शुद्ध हींग प्रयोग करें।
हींग
4. त्रिफला चूर्ण
रात को सोते समय गुनगुने पानी के साथ 1 चम्मच त्रिफला लेने से पाचन व चर्बी नियंत्रण में सहायता मिल सकती है।
5. जीवनशैली सुधार
तला-भुना और अत्यधिक तेल कम करें
रोज 30 मिनट टहलना
तनाव कम रखें
धूम्रपान और शराब से दूरी रखें
पर्याप्त नींद लें
6. योग व प्राणायाम
हल्के अभ्यास लाभकारी माने जाते हैं:
अनुलोम-विलोम
भ्रामरी
गहरी श्वास
अनुलोम-विलोम
महत्वपूर्ण सावधानी यदि ब्लॉकेज अधिक है, या डॉक्टर ने स्टेंट/एंजियोप्लास्टी की सलाह दी है, तो केवल घरेलू उपायों पर निर्भर न रहें। आयुर्वेदिक औषधियाँ भी वैद्य या डॉक्टर की सलाह से ही लें, विशेषकर यदि आप BP, शुगर या ब्लड थिनर की दवा ले रहे हों।
आयुर्वेद में कहा गया है:
हितभुक्, मितभुक्, ऋतभुक्
अर्थात् हितकारी, सीमित और समयानुसार भोजन ही स्वास्थ्य का आधार है।

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