ऋग्वेद (9.97.34): चेतना, त्रिगुण और शरीर तंत्र की वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक मीमांसा
अनुसंधानकर्ता: ज्ञान विज्ञान ब्रह्मज्ञान (GVB)
मूल मंत्र एवं पाठ
तिस्रो वाच उदोरते गावो मिमन्ति घेनवः।
हरिरेति कनिक्रदत्॥
ऋग्वेद के नवम मण्डल का यह मंत्र केवल बाहरी प्रकृति या सोम रस की शुद्धि मात्र नहीं है। सूक्ष्म दृष्टि से देखने पर यह मानव शरीर (माइक्रोकोस्म) और ब्रह्मांड (मैक्रोकोस्म) के अंतर्संबंधों का एक जीवंत वैज्ञानिक दस्तावेज है। हमारी चेतना, जठराग्नि, और भौतिक शरीर किस प्रकार इस मंत्र के सूत्रों में बंधे हैं, आइए इसकी सप्रमाण वैज्ञानिक व्याख्या को समझें।
1. तिस्रो वाच उदोरते: चेतना की तीन तरंगें और त्रिगुण वृत्तियाँ
यहाँ 'तिस्रो वाच' का सीधा संबंध चेतना से उठने वाली तीन मूलभूत तरंगों—सत्, रज और तम से है। आधुनिक न्यूरो-साइंस और क्वांटम भौतिकी मानती है कि मानव मस्तिष्क और चेतना लगातार विभिन्न आवृत्ति (Frequencies) पर दोलन करती है।
- उदोरते (उदर + रते): 'उदर' का अर्थ पेट या हमारा पाचक तंत्र (Digestive System) भी है। आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा विज्ञान (Gut-Brain Axis) दोनों यह मानते हैं कि हमारा उदर हमारा 'दूसरा मस्तिष्क' है। जब उदर में पाचन क्रिया सक्रिय (रते/कार्यरत) होती है, तो वहीं से शरीर की ऊर्जा का निर्धारण होता है, जो अंततः इन तीन वृत्तियों को प्रभावित करती है।
2. गावो मिमन्ति घेनवः: सौर रश्मियाँ और भौतिक शरीर का कष्ट
वैदिक विज्ञान में 'गो' का अर्थ केवल पशु नहीं, वरन सूर्य की किरणें अथवा पृथ्वी तत्व है जिससे इस पंचभौतिक शरीर का निर्माण होता है।
"शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्" — कुमारसंभवम् (कालिदास)
अर्थात, धर्म के साधन के लिए यह शरीर ही पहला माध्यम है।
- धेनवः (धन और पोषण का साधन): यह शरीर ही वह साधन है जो हमें दूध, घृत और जीवन रूपी अमृत प्रदान करता है। पृथ्वी और प्रकृति हमारे लिए 'धेनु' (पोषणकर्ता) हैं।
- मिमन्ति: यह भौतिक शरीर की सीमाओं, व्याधियों और सांसारिक दुखों (भौतिक कष्टों) को प्रकट करता है। जब प्रकृति का संतुलन बिगड़ता है, तो यही शरीर पीड़ा में क्रंदन करता है।
3. हरिरेति कनिक्रदत्: ऊर्जा का हरण और शब्द-ब्रह्म का सिंहनाद
'हरि' का एक अर्थ है— हरण करने वाला। यह काल, या भौतिक प्रकृति, गुप्तरूप से लगातार मनुष्य की जीवनी शक्ति (Vital Energy) का हरण कर रही है। संसार और पृथ्वी के आकर्षण में फंसा शरीर इस क्षरण को रोक नहीं पाता।
परिवर्तन की वैज्ञानिक पराकाष्ठा:
जब जीवात्मा इस रहस्य को समझ लेती है, तो वह प्रकृति के इस चक्रव्यूह से आगे बढ़ जाती है। वह शरीर के विकारों को अपने पूर्ण नियंत्रण (Mastery) में ले लेती है। आत्मा जब इस शरीर का वास्तविक स्वामी बनती है, तब वह 'शब्द ब्रह्म' के स्तर पर आरूढ़ हो जाती है।
तब वह **'कनिक्रदत्'** होकर— अर्थात अज्ञान के बंधनों को छिन्न-भिन्न करती हुई, 'हूँकार' भरती हुई गर्जना करती है और इस भौतिक संसार पर अपने चेतन साम्राज्य (Conscious Realm) की स्थापना करती है।
शारीरिक और क्वांटम प्रमाण (Physiological & Quantum Evidence)
| मंत्र के पद | शारीरिक/जैविक तत्व | क्वांटम/ब्रह्मांडीय स्तर |
|---|---|---|
| तिस्रो वाच उदोरते | उदर (पाचन तंत्र/Gut) और त्रिगुण वृत्तियाँ (सत्-रज-तम) | चेतना की तीन तरंग श्रेणियां (Three States of Consciousness) |
| गावो / घेनवः | पृथ्वी तत्व से निर्मित भौतिक देह (अमृत/घृत का साधन) | सौर रश्मियाँ और ऊर्जा तरंगें (Energy Waves/Rays) |
| मिमन्ति | शारीरिक व्याधियां और भौतिक कष्ट का प्रकटीकरण | ऊर्जा का घनत्व और घर्षण (Entropy) |
| हरिरेति कनिक्रदत् | आत्मा द्वारा शक्ति के क्षरण को रोककर शरीर पर नियंत्रण | शब्द ब्रह्म का प्रकटीकरण, शुद्ध चेतना का सिंहनाद |
ऋग्वेद सोम पवमान (शुद्ध किए जा रहे सोम रस) की स्तुति में है।
वैदिक सूक्तों की गहराई केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि ध्वनि विज्ञान (Acoustics), तरंग सिद्धांत (Wave Theory) और ब्रह्मांडीय ऊर्जा के वैज्ञानिक सिद्धांतों से भी जुड़ी है। नीचे इस मंत्र की प्रामाणिक वैज्ञानिक और आध्यात्मिक व्याख्या दी गई है:
📅 मंत्र, अन्वय और शब्दार्थ
मूल मंत्र: वाणियाँ / तीन ध्वनियाँ।
उदोरते: ऊपर उठती हैं या प्रकट होती हैं।
गावो / घेनवः: दुधारू गाएँ (यहाँ ध्वनि तरंगों या रश्मियों के प्रतीक रूप में)।
मिमन्ति: रंभाती हैं या ध्वनि उत्पन्न करती हैं।
हरिः सूर्य, जीवनी शक्ति, या सोम रस (जो ऊर्जा का प्रतीक है)।
एति: आगे बढ़ता है।
कनिक्रदत्: शब्द करता हुआ / गर्जना करता हुआ।
🔬 वैज्ञानिक एवं दार्शनिक व्याख्या (Scientific & Philosophical Analysis)
इस मंत्र के वैज्ञानिक अर्थ को समझने के लिए हमें इसे तीन मुख्य दृष्टिकोणों से देखना होगा:
1. ध्वनि विज्ञान और तीन वाणियाँ (Acoustics & The Three Frequencies)
मंत्र कहता है कि "तिस्रो वाच उदोरते" (तीन वाणियाँ प्रकट होती हैं)। भारतीय ध्वनि विज्ञान और आधुनिक भौतिकी (Physics) में इसका गहरा संबंध है:
वैदिक परिप्रेक्ष्य (वाक् के स्तर): महर्षि पतंजलि और योग शास्त्रों के अनुसार वाणी के चार स्तर होते हैं— परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी। आम मनुष्य केवल 'वैखरी' (जो कान से सुनाई दे) सुनता है। लेकिन ब्रह्मांडीय स्तर पर तीन वाणियाँ (पश्यन्ती, मध्यमा, वैखरी) सक्रिय रूप से ऊर्जा का संचार करती हैं।
आधुनिक भौतिकी (The Sound Spectrum): आधुनिक विज्ञान के अनुसार ध्वनि तरंगों को तीन मुख्य श्रेणियों में बांटा गया है:
1. nfrasound (अपश्रव्य): 20\text{ Hz} से कम की आवृत्ति, जो हमें सुनाई नहीं देती लेकिन ब्रह्मांडीय हलचलों में मौजूद है।
2. Audible Range (श्रव्य): 20\text{ Hz} से 20,000\text{ Hz}, जो जीव सुन सकते हैं।
3. Ultrasound (पराध्वनि): 20,000\text{ Hz} से अधिक, जो उच्च ऊर्जा तरंगें हैं।
मंत्र का वैज्ञानिक संकेत है कि जब सृष्टि में ऊर्जा का प्रवाह (हरिरेति) होता है, तो ध्वनि का यह त्रिविध स्वरूप (Three-fold sound spectrum) तरंगों के रूप में गूंजता है।
2. ब्रह्मांडीय ऊर्जा और तरंग सिद्धांत (Cosmic Energy & Wave Theory)
मंत्र की दूसरी पंक्ति कहती है— "हरिरेति कनिक्रदत्" (वह 'हरि' यानी प्रकाश/ऊर्जा तीव्र ध्वनि करता हुआ आगे बढ़ता है)।
साउंड और लाइट का अंतर्संबंध: भौतिक विज्ञान (Physics) के अनुसार, ऊर्जा का स्थानांतरण हमेशा तरंगों (Waves) के माध्यम से होता है। सूर्य से आने वाली सौर हवाएं (Solar Winds) और चुंबकीय तरंगें जब अंतरिक्ष में यात्रा करती हैं, तो उनमें एक विशिष्ट 'कंपन' या प्लाज्मा ध्वनि होती है, जिसे हाल ही में NASA ने रिकॉर्ड भी किया है (सूर्य की 'ॐ' जैसी गूंज)।
'गावो मिमन्ति घेनवः' का वैज्ञानिक प्रतीक: वैदिक संस्कृत में 'गो' (गौ) शब्द का अर्थ केवल गाय नहीं, बल्कि "किरण" (Ray) या "तरंग" (Wave) भी होता है। जैसे दुधारू गाय बछड़े को देखकर दूध बहाती है और रंभाती है, वैसे ही ब्रह्मांडीय ऊर्जा केंद्र (सोम या सूर्य) से ऊर्जा की किरणें (गावो) ध्वनि करती हुई चारों तरफ फैलती हैं।
📜 प्रामाणिक साक्ष्य (Textual Proofs & References)
इस व्याख्या को प्रमाणित करने के लिए निम्नलिखित प्राचीन ग्रंथों के साक्ष्य अत्यंत महत्वपूर्ण हैं:
क. ऋग्वेद (१.१६४.४५) - चार वाक् का प्रमाण
चत्वारि वाक् परिमिता पदानि तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिणः।
गुहा त्रीणि निहिता नेङ्गयन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति॥
अर्थ: वाणी के चार चरण हैं। इनमें से तीन गूढ़ (गुहा में छिपे) हैं जिन्हें सामान्य मनुष्य नहीं समझ पाते, वे केवल चौथे चरण (वैखरी) को बोलते और सुनते हैं। यही 'तिस्रो वाच' का आधार है।
ख. शतपथ ब्राह्मण (४.६.९.२०)
'वाग् वै सोमः' अर्थात वाणी ही सोम है। जब सोम (ऊर्जा) का प्रवाह होता है, तो ध्वनि तरंगों का सृजन अनिवार्य रूप से होता है।
📝 निष्कर्ष (Conclusion)
यह मंत्र कोई साधारण कर्मकांडीय गान नहीं है। यह इस वैज्ञानिक सत्य की उद्घोषणा है कि ब्रह्मांड की मूल प्रकृति 'कंपनमयी' (Vibrational) है। जब भी ऊर्जा (हरि/सोम) गति करती है, तो वह तरंगों (गावो) के रूप में फैलती है और तीन स्तरों (तिस्रो वाच) पर ध्वनि उत्पन्न करती है। आधुनिक विज्ञान भी आज स्वीकार करता है कि String Theory के अनुसार ब्रह्मांड के सबसे सूक्ष्म कण कुछ और नहीं, बल्कि केवल 'ऊर्जा के कंपन' हैं।
तिस्रो वाच उदोरते गावो मिमन्ति घेनवः!
हरिरेति कनिक्रदत् ॥
(तिस्र) तीन (वाचः) ध्वनियों [अ, उ, म्] (उदीरते) उठ रही हैं। मानो (धेनवः) दुधेला (गावः) गायें [बछड़ों को] (मिमन्ति) बुला रही हैं। (हरिः) चित चोर (कनिक्रदत्) गरजता हुआ (एति) आ रहा है।
प्यारे ! तुमने मेरा हृदय त्रा लिया है। मुझे पता भी नहीं होने दिया और मेरी सारी सुध-बुध हर ली है। यह क्या तुम्हारी आवाज आ रही है ?
ईश्वर भक्ति हो व्यक्ति निर्माण का प्रथम और अन्तिम सोपान है। भक्त की विह्वल पुकार उसके तन-मन को निर्मल कर आत्म-विकास का पथ प्रशस्त करती है।
पृथिवी से आकाश से, बहती हुई नदियों से, चलती हुई वायु के झकोरों से, गरजते हुए बादलों से, कड़कती हुई बिजली से क्या तुम्हारी आवाज आ रही है ? सुनसान रात में, तारों भरे आकाश के नीचे, जब सारा संसार मौन साधे सो रहा है, वायु भी थक कर अपने पङ्ख सुकेड़ लेती है--ऐसे सन्नाटे में मैं तुम्हारे नाम के जाप को सुनता हूँ। अ,उ, म्, ओ३म् । क्या यह तुम बोल रहे होते हो ?
सृष्टि की प्रत्येक क्रिया प्रत्येक चेष्टां तुम्हारा गान है। मनोमोहक उद्गीथ है। चेष्टा आरम्भ हुई। मानो गायक का गला खुल गया । गला खुलना क्या है ? 'अ' का उच्चारण । तान उड़ने लगी- 'उ'-उ-उ ।' यह तान की उड़ान है क्रिया का लम्बा क्रियामाण रूप । गायक लय के मजे ले लेकर अन्त को अपनी ही लय में लीन होने लगा। उसके होंठ मिल गये। गान के मिठास ने चिपका दिये। यह ओठों का चिपकना और क्या है ? 'म्' का मूर्त रूप।
संसार का अणु-अणु ओम् का उच्चारण कर रहा है। क्या मधुर गीत है ? उतना ही मधुर जितना जङ्गल से लौटी हुई गौ का रंभा-गीत। इस रंभा गीत को कोई बछड़े के कान से सुनो। गौ के स्तनों में दूध भर रहा है, बछड़े के पेट में भूख उमड़ रही है। रंभा नाद दूध के सह को भूख के ओठों से मिला रहा है। बछड़े को माँ के स्तन के सिवा चैन नहीं। स्तन मानो माँ के मुख से ही बछड़े के कानों में दूध उडेल रहा है।
मेरी जङ्गल से लौटी हुई माँ ! आ !! रंभा ! रँभा !! अउम्। यह तीन अक्षर सुनाये जा । मेरा रोंगटा रोंगटा इस राग का भूखा है। मेरे रोम-रोम का मुख इस अपने स्तन से लगा ले । दूध के साथ-साथ तेरे वात्सल्य रस का पान करू। यही मेरा सोम-पान है। यही मेरे व्यक्तित्व निर्माण की आधार शिला है।
माँ ! मैं तेरा बछड़ा हूं। मुझे छोड़ कर तू सारा दिन कहाँ रही ? अब तो साँझ हो रही हैं। तेरे पीछे मैंने काफी धूल उड़ाई है। मेरे कुकर्मों की धूल मेरे भाग्यों की धूलि-वेला बन गई है। माँ.! आ ! इस धूलि-वेला में दौड़ती हुई आ ! गरजती हुई आ ! हाँपती हुई आ! बच्चे का हृदय तेरे स्तनों में-- तेरी छातियों में है। आ! उसकी भूख, प्यास-मैया के दर्शन की भूख उसके रंक्षा-नाद की प्यास हर ले। अपने दूध के हाथों, अपने रंभा-नाद के हाथों हर ले। विश्वधात्री माँ मुझे निष्कलुष और पवित्र बनाये ।
🔥विक्रमादित्य के नवरत्न!!!
इतिहास में उज्जैनी नरेश चक्रवर्ती सम्राट महाराजाधिराज वीर विक्रमादित्य के नवरत्नों की कोई चर्चा पाठ्यपुस्तकों में नहीं है। जबकि सत्य यह है कि महाराजा विक्रमादित्य की नकल करके कुछ धूर्तों ने अकबर को महान सिद्ध करने के लिए आजादी के बाद इतिहास में लिख दिया कि अकबर के भी नौ रत्न थे।
खैर राजा विक्रमादित्य के दरबार के नवरत्नों के विषय में आप सब लोग जानते ही हैं फिर भी बताने में हर्ज नहीं है। राजा विक्रमादित्य के दरबार में मौजूद नवरत्नों में उच्च कोटि के कवि, विद्वान, गायक और गणित के प्रकांड पंडित शामिल थे, जिनकी योग्यता का डंका धरा पर आज भी बजता है।
१ ➡️ धन्वन्तरि~
नवरत्नों में इनका स्थान गिनाया गया है। इनके रचित नौ ग्रंथ पाये जाते हैं। वे सभी आयुर्वेद चिकित्सा शास्त्र से सम्बन्धित हैं। चिकित्सा में ये बड़े सिद्धहस्त थे। आज भी किसी वैद्य की प्रशंसा करनी हो तो उसकी ‘धन्वन्तरि’ से उपमा दी जाती है।
२★क्षपणक~
जैसा कि इनके नाम से प्रतीत होता है, ये बौद्ध संन्यासी थे। इससे एक बात यह भी सिद्ध होती है कि प्राचीन काल में मन्त्रित्व आजीविका का साधन नहीं था अपितु जनकल्याण की भावना से मन्त्रिपरिषद का गठन किया जाता था। यही कारण है कि संन्यासी भी मंत्रिमंडल के सदस्य होते थे। इन्होंने कुछ ग्रंथ लिखे जिनमें ‘भिक्षाटन’ और ‘नानार्थकोश’ ही उपलब्ध बताये जाते हैं।
३★अमर सिंह~
ये प्रकाण्ड विद्वान थे। बोध-गया के वर्तमान बुद्ध-मन्दिर से प्राप्य एक शिलालेख के आधार पर इनको उस मन्दिर का निर्माता कहा जाता है। उनके अनेक ग्रंथों में एक मात्र ‘अमरकोश’ ग्रन्थ ऐसा है कि उसके आधार पर उनका यश अखण्ड है। संस्कृतज्ञों में एक उक्ति चरितार्थ है जिसका अर्थ है ‘अष्टाध्यायी’ पण्डितों की माता है और ‘अमरकोश’ पण्डितों का पिता। अर्थात् यदि कोई इन दोनों ग्रंथों को पढ़ ले तो वह महान पण्डित बन जाता है।
४★शंकु~
इनका पूरा नाम ‘शङ्कुक’ है। इनका एक ही काव्य-ग्रन्थ ‘भुवनाभ्युदयम्’ बहुत प्रसिद्ध रहा है। किन्तु आज वह भी पुरातत्व का विषय बना हुआ है। इनको संस्कृत का प्रकाण्ड विद्वान माना गया है।
५★वेतालभट्ट~
विक्रम और वेताल की कहानी जगतप्रसिद्ध है। ‘वेताल पंचविंशति’ के रचयिता यही थे, किन्तु कहीं भी इनका नाम देखने सुनने को अब नहीं मिलता। ‘वेताल-पच्चीसी’ से ही यह सिद्ध होता है कि सम्राट विक्रम के वर्चस्व से वेतालभट्ट कितने प्रभावित थे। यही इनकी एक मात्र रचना उपलब्ध है।
६★घटखर्पर~
जो संस्कृत जानते हैं वे समझ सकते हैं कि ‘घटखर्पर’ किसी व्यक्ति का नाम नहीं हो सकता। इनका भी वास्तविक नाम यह नहीं है। मान्यता है कि इनकी प्रतिज्ञा थी कि जो कवि अनुप्रास और यमक में इनको पराजित कर देगा उनके यहां वे फूटे घड़े से पानी भरेंगे। बस तब से ही इनका नाम ‘घटखर्पर’ प्रसिद्ध हो गया और वास्तविक नाम लुप्त हो गया। इनकी रचना का नाम भी "घटखर्पर काव्यम" ही है। यमक और अनुप्रास का वह अनुपमेय ग्रन्थ है। इनका एक अन्य ग्रन्थ ‘नीतिसार’ के नाम से भी प्राप्त होता है।
७★वराहमिहिर~
भारतीय ज्योतिष-शास्त्र इनसे गौरवास्पद हो गया है। इन्होंने अनेक ग्रन्थों का प्रणयन किया है। इनमें ‘ बृहज्जात’ ,‘सूर्यसिद्धांत’ , ‘बृहस्पति संहिता’ ‘पंच सिद्धांति’ मुख्य है।‘गणक तरंगिणी’, ‘लघु जातक’, ‘समाज संहिता’ , ‘विवाह पटल’ योग ‘योग यात्रा’, आदि-आदि का भी इनके नाम से उल्लेख पाया जाता है।
८★वररुचि~
कालिदास की भांति ही वररुचि भी अन्यतम काव्यकर्ताओं में गिने जाते हैं। ‘सदुक्तिकर्णामृत’, ‘सुभाषितावलि’ तथा ‘शार्ङ्धर संहिता’, इनकी रचनाओं में गिनी जाती हैं।
९★कालिदास~
ऐसा माना जाता है कि कालिदास सम्राट विक्रमादित्य के प्राणप्रिय कवि थे। उन्होंने भी अपने ग्रंथों में विक्रम के व्यक्तित्व का उज्जवल स्वरूप निरूपित किया है कालिदास की कथा विचित्र है। कहा जाता है कि उनको देवी ‘काली’ की कृपा से विद्या प्राप्त हुई थी। इसीलिए इनका नाम ‘कालिदास’ पड़ गया। संस्कृत व्याकरण की दृष्टि से यह कालीदास होना चाहिए था। किंतु अपवाद रूप में कालिदास की प्रतिभा को देखकर इसमें उसी प्रकार परिवर्तन नहीं किया गया जिस प्रकार कि ‘विश्वामित्र’ को उसी रूप में रखा गया। जो हो, कालिदास की विद्वता और काव्य प्रतिभा के विषय में अब दो मत नहीं है। वे न केवल अपने समय के अप्रितम साहित्यकार थे अपितु आज तक भी कोई उन जैसा अप्रितम साहित्यकार उत्पन्न नहीं हुआ है। उनके चार काव्य और नाटक प्रसिद्ध है। शकुंतला उनकी अन्यतम कृति मानी जाती है।
🌷 ओ३म् पुनर्नः पितरो मनो ददातु दैव्यो जनः । जीवं व्रातँ सचेमहि ।।(यजुर्वेद ३\५५)
💐 अर्थ:- विद्वान माता-पिता, आचार्यों की शिक्षा के बिना मनुष्यों का जन्म सफल नहीं होता और मनुष्य भी उस शिक्षा के बिना पूर्ण जीवन वा कर्म के संयुक्त करने को समर्थ नहीं हो सकते । इससे सब काल के विद्वान माता-पिता और आचार्यों को उचित है कि अपने पुत्र आदि को अच्छे प्रकार उपदेश से शरीर और आत्मा के बलवाले करें ।

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