ऋग्वेद नासदीय सूक्त और यजुर्वेद १८.६६: सृष्टि की उत्पत्ति का वैज्ञानिक रहस्य | GVB Research

नासदीय सूक्त और विज्ञान

सृष्टि की उत्पत्ति: नासदीय सूक्त और आधुनिक विज्ञान

"तम आसीत्तमसा गूढमग्रेऽप्रकेतं सलिलं सर्वमा इदं।
तुच्छ्येनाभ्वपिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिना जायतैकं॥"

यह ऋग्वेद का वह अद्भुत मंत्र है जो ब्रह्मांड के जन्म की गुत्थी सुलझाता है। आइए इसका वैज्ञानिक विश्लेषण देखें:

1. डार्क एनर्जी और अंधकार

मंत्र कहता है 'तमसा गूढम्'। विज्ञान के अनुसार, ब्रह्मांड का 95% हिस्सा आज भी Dark Matter और Dark Energy है, जो अदृश्य है। सृष्टि के आरंभ में भी सब कुछ अव्यक्त और अंधकारमय था।

2. कॉस्मिक प्लाज्मा (Cosmic Plasma)

'सलिलं सर्वमा इदं' का अर्थ है कि सब कुछ एक तरल की भांति था। बिग बैंग के कुछ ही सेकंड बाद ब्रह्मांड 'क्वार्क-ग्लूऑन प्लाज्मा' की अवस्था में था, जो एक अति-गर्म तरल जैसा व्यवहार करता था।

3. ऊष्मप्रवैगिकी (Thermodynamics)

मंत्र में 'तपस' शब्द का प्रयोग हुआ है। विज्ञान मानता है कि सृष्टि के सृजन के लिए 'Heat' (तापमान) सबसे अनिवार्य घटक था। बिना थर्मल ऊर्जा के पदार्थ का संघनन (Condensation) संभव नहीं था।

निष्कर्ष

जहाँ आधुनिक विज्ञान गणितीय समीकरणों से ब्रह्मांड को समझता है, वहीं नासदीय सूक्त के ऋषियों ने हज़ारों साल पहले इसे अंतर्ज्ञान और दर्शन के माध्यम से व्यक्त किया था। दोनों का गंतव्य एक ही है—परम सत्य की खोज।


प्रस्तुत: विज्ञान और अध्यात्म संगम
चेतन की तीन परतें और परमाणु नाभि

तम के आवरण और सूक्ष्म चेतन का रहस्य

"तुच्छ्येनाभ्वपिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिना जायतैकं॥"

1. तम की दो परतें: पदार्थ और चेतना

सृष्टि के आरंभ में दो प्रकार का अंधकार (तम) था। एक जिसने पदार्थ (Matter) को ढका हुआ था और दूसरा जिसने बोध (Awareness) को ढका था। इन दो परतों के नीचे ही वह 'गुप्त' सत्ता छिपी थी।

2. सूक्ष्म चेतन की गतिशीलता

यह चेतन क्यों गतिशील हुई? क्योंकि इसके भीतर 'सामर्थ्य' था। यह अप्राकृतिक सलिलं है—ऐसा द्रव जो हर वस्तु को स्वयं में लीन करने (पचाने) की क्षमता रखता है।

3. परमाणु नाभि और मानव शरीर

जिसे हम 'तुच्छ' (सूक्ष्म) समझते हैं, वही शक्ति हर परमाणु के नाभिकीय केंद्र में विद्यमान है। यह वही 'तप' है जो ब्रह्मांड में परमाणु को बांधे रखता है और मानव शरीर में 'नाम-रूप-संस्कार' के रूप में प्रकट होकर अपनी 'महिमा' सिद्ध करता है।

ज्ञान-विज्ञान का यह मेल ही "ब्रह्मज्ञान" है।

तम आसीत्तमसा गूढमग्रेऽप्रकेतं सलिलं सर्वमा इदं।

तुच्छ्येनाभ्वपिहितं यदासीत्तपसस्तन्महिना जायतैकं॥

ऋग्वेद 10/129/3, नासदिय सुक्त मंत्र 

तम → अंधकार

आसीत् → था

तमसा → अंधकार से

गूढम् → ढका हुआ, छिपा हुआ

अग्रे → प्रारंभ में

अप्रकेतं → बिना किसी पहचान/लक्षण के

सलिलम् → तरल/अव्यक्त संभाव्यता

सर्वम् → सब कुछ

आ इदम् → यह सम्पूर्ण जगत

तुच्छ्येन → शून्य जैसे सूक्ष्म आवरण से

अभ्वा → रिक्तता, निराकार शून्यता

अपिहितम् → ढका हुआ

यत् आसीत् → जो था

तपसः → चेतन ऊष्मा/आंतरिक शक्ति

तत् महिना → उसकी महिमा/बल से

जायत → उत्पन्न हुआ

एकम् → वह एक तत्व

सृष्टि के आरंभ में सब कुछ अंधकार से ढका था।

कोई रूप नहीं था, कोई पहचान नहीं थी, कोई अलग अस्तित्व नहीं था।

सब कुछ एक अव्यक्त संभावना की अवस्था में था—

जैसे सब कुछ है भी, और प्रकट भी नहीं है।

उस गहन शून्यता में एक तप ( आंतरिक चेतन शक्ति) विद्यमान थी।

उसी तप की महिमा से “एक” प्रकट हुआ—

वही प्रथम सत्ता, जिससे आगे सम्पूर्ण सृष्टि निकली।

यह मंत्र सृष्टि की किसी भौतिक घटना का वर्णन नहीं कर रहा।

यह अस्तित्व की सबसे सूक्ष्म अवस्था की ओर संकेत करता है।

१) “तम आसीत् तमसा गूढम्”

यह साधारण अंधेरा नहीं है।

यह वह अवस्था है जहाँ प्रकाश भी नहीं, अंधकार भी नहीं — क्योंकि दोनों का अनुभव करने वाला कोई भेद ही नहीं था।

अंधकार तभी अर्थ रखता है जब प्रकाश की संभावना हो।

पर यहाँ तो पहचान का आधार ही नहीं था।

इसलिए ऋषि कहते हैं —

२) “अप्रकेतं”

अर्थात ऐसा कि जिसे किसी संकेत, किसी परिभाषा, किसी भाषा में पकड़ा नहीं जा सकता।

यह बताता है कि सृष्टि का मूल किसी वस्तु से नहीं बना।

वह किसी पदार्थ का जोड़ नहीं है।

वह एक ऐसी अव्यक्त सत्ता थी

जो स्वयं में पूर्ण थी,

पर अभी व्यक्त नहीं हुई थी।

३) “सलिलं सर्वमा इदम्”

यहाँ सलिल जल नहीं है।

यह तरलता का प्रतीक है—

एक ऐसी अनिश्चित, निराकार संभावना

जिसमें सब कुछ छिपा है

पर कुछ भी अलग-अलग नहीं है।

जैसे बीज में वृक्ष है,

पर दिखता नहीं।

वैसे ही उस अव्यक्त सत्ता में सम्पूर्ण ब्रह्मांड निहित था।

फिर मंत्र कहता है—

४) “तुच्छ्येनाभ्वपिहितम्”

अर्थात वह सत्ता शून्यता जैसे आवरण से ढकी थी।

यहाँ बड़ा रहस्य है—

वेद कह रहा है कि

शून्यता वास्तव में शून्य नहीं होती।

जो हमें रिक्त दिखता है,

वह अनंत संभावना का गर्भ होता है।

फिर—

५) “तपसस्तन्महिना जायतैकम्”

यहाँ “तप” का अर्थ तपस्या नहीं।

यह चेतना की आंतरिक ऊष्मा है—

वह प्रथम स्पंदन

जिससे मौन में कंपन उठा।

और उसी कंपन से “एक” प्रकट हुआ।

यही “एक” अस्तित्व का पहला व्यक्त रूप है।

मनुष्य का जीवन भी ऐसा ही है।

जब व्यक्ति भ्रम, अज्ञान और दिशा-हीनता के अंधकार में होता है, तो बाहर कुछ स्पष्ट नहीं दिखता।

पर उसी अंधकार के भीतर

एक चेतन शक्ति छिपी होती है।

जब वह भीतर तप करता है—

चिंतन, धैर्य, आत्ममंथन—

तब उसके भीतर भी “एक सत्य” जन्म लेता है।

आज विज्ञान भी पूछता है—

Big Bang से पहले क्या था?

विज्ञान कहता है—

space-time भी नहीं था।

वेद कहता है—

एक अव्यक्त, अगोचर स्थिति थी

जिसे हम समझ नहीं सकते,

पर उसी चेतन तप से सृष्टि प्रकट हुई।

हजारों वर्ष पहले वेद उन्हीं प्रश्नों का उत्तर दे रहा था

जो आधुनिक cosmology आज पूछ रही है।

🔥यतो_धर्मः_ततो_जयः 

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    जहाँ धर्म है वहाँ विजय है।

महाभारत में अनेक स्थानों पर, यह बात कही गई है।इस पर विचार करने पर सर्वप्रथम धर्म का शाब्दिक अर्थ जानना पड़ेगा।”धृ” मे “मन्” प्रत्यय लगा कर धर्म शब्द बना है ,जिसमें “धृ”धातु का अर्थ धारण और पोषण करना है।

शाब्दिक दृष्टि से मतलब हुआ कि धर्म वह है, जो मनुष्य को मनुष्यता धारण कराए और आजीवन उस मनुष्यता को ही परिपुष्ट करे।इस प्रकार फलित हुआ कि, धर्म मानव जीवन का वह तत्व है, जिससे वह मनुष्य बनता है।

  तब प्रश्न उठा कि वह क्या है जिससे मनुष्य की मनुष्यता सुरक्षित रहती है, तो उत्तर आया ,आचरण। (आचार:परमो धर्म: ) मनुष्य जीवन का आदर्श ही है मानवीय विचाराचार ।

गीतोक्त बात -स्वधर्मे निधनं

श्रेय: परधर्मो भयावह:” ने और भी स्पष्ट किया कि यदि हम मानवीय आचारादि त्याग कर अमानवीय व्यवहार ग्रहण करें तो हम राक्षस/पशु कहे जाने योग्य होंगे।इसीलिये अपने मानव जीवन मूल्यों-त्याग, करूणा, दया, क्षमा, धैर्य, सन्तोष आदि का पालन करते हुए उसके लिये मर मिटना, श्रेयस्कर है।नहीं तो संग्रह और असन्तोष आदि तो भयंकर दु:ख के ही कारण बनते हैं।

  अतः सर्वस्व न्योछावर करके भी “धर्म”(मानवीय कर्तव्य कर्म पूर्वक सत्याचरण)मार्ग पर ही चलने में विजय प्राप्ति सुनिश्चित है।और अन्तिम बात तो ये है कि धर्म न केवल इस जन्म में वास्तविक विजयकारक है, अपितु अन्यज्जन्म में मानव का एकमात्र साथी भी है-देहश्चितायां परलोक मार्गे धर्मानुगो गच्छति जीव एक:।

🌷ओ३म् अग्निरस्मि जन्मना जातवेदा घृतं मे चक्षुरमृतं मऽआसन्।अर्कस्त्रधातू रजसो विमानोऽजस्रो घर्मो हविरस्मि नाम॥ यजुर्वेद १८-६६॥

  💐 अर्थ  :-  अग्नि मुझ में जन्म से है, और मैं इस प्रारंभिक ज्ञान से निरंतर ज्ञान प्राप्त करता रहूं। मेरे चक्षु(घृत) प्रकाश ग्रहण करने वाली हो, मेरी वाणी मधुर हो। मेरा मन आराधना के लिए हो, मेरा मस्तिष्क ज्ञान के लिए हो, और शरीर उत्तम कर्मों के लिए हो। 'हे ईश्वर, मेरे ज्ञान में वृद्धि करो और मेरी वाणी को मधुर करो।

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अग्नि: ब्रह्मांडीय ऊर्जा का आत्म-साक्षात्कार

यजुर्वेद १८.६६: अग्नि का सार्वभौमिक स्वरूप

ओ३म् अग्निरस्मि जन्मना जातवेदा घृतं मे चक्षुरमृतं मऽआसन्।
अर्कस्त्रधातू रजसो विमानोऽजस्रो घर्मो हविरस्मि नाम॥

ब्रह्मांडीय ऊर्जा (Universal Energy)

इस मंत्र में ऊर्जा स्वयं बोल रही है। "अग्निरस्मि जन्मना" का अर्थ है कि ऊर्जा आदि-अनंत है। विज्ञान जिसे 'Conservation of Energy' कहता है, वेद उसे 'अजस्र' (निरंतर) कहता है।

1. जातवेदा: सूचना का केंद्र

अग्नि सब कुछ जानती है क्योंकि वह हर परमाणु के 'नाभिक' में सूचना (Data) के रूप में स्थित है। वह सृष्टि की रचना और विनाश की प्रक्रिया की साक्षी है।

2. रजसो विमानो: विस्तार का मापक

ऊर्जा ही अंतरिक्ष (Space) को आकार देती है। यह रजस (Dynamics) का विमान है, जो पूरे ब्रह्मांड की गतिशीलता को नियंत्रित करता है।

3. हविरस्मि: स्वयं की आहुति

अग्नि ही ईंधन है और अग्नि ही ज्वाला। यह द्रव्यमान के ऊर्जा में रूपांतरण की वह प्रक्रिया है जिससे तारे और सूर्य चमकते हैं।

यह मंत्र हमें सिखाता है कि हमारे भीतर की चेतना और बाहर की ब्रह्मांडीय ऊर्जा एक ही है। हम स्वयं उस 'अग्नि' का अंश हैं जो अमृत और प्रकाश से परिपूर्ण है।

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