🔥स्वस्थ आयु के लिए योग।
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🔥योगश्चित्तवृत्तिनिरोध:।(योगदर्शन)
चित्त की वृत्तियों को सब बुराईयों से हटकर शुभ कर्मों में स्थिर करके, परमेश्वर के समीप में मोक्ष को प्राप्त करने को योग कहते हैं। और वियोग उसको कहते हैं कि परमेश्वर और उसकी आज्ञा के विरुद्ध बुराईयों में फंस के ईश्वर से दूर हो जाना।
चित्त की वृत्ति को रोकने के उपाय - ( एक ) जैसे जल के प्रवाह को एक ओर से दृढ़ बांध के द्वारा रोक देते है तब वह जिस ओर नीचा होता है उस ओर चल के वहीं स्थिर हो जाता है। ( दुसरा) उपासक योगी और संसारी मनुष्य जब व्यवहार में प्रवृत होते हैं तब योगी की वृत्ति तो सदा हर्ष शोक रहित आनन्द से प्रकाशित होकर उत्साह में ही डूबी रहती है। उपासक योगी की वृत्ति तो ज्ञानरूप प्रकाश में सदा बढ़ती रहती है और संसारी मनुष्य की वृत्ति सदा अंधकार में फंसती जाती है।
योगदर्शन के अनुसार उपासना योग के आठ अंग - यम,नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।
यह उपासना योग दुष्ट मनुष्य को सिद्ध नही होती क्योंकि जब तक मनुष्य दुष्ट कामों से अलग होकर अपने मन को शान्त और आत्मा को पुरुषार्थी नही करता तथा भीतर के व्यवहारों को शुद्ध नही करता तब तक कितना ही पढ़े वा सुनें उसको परमेश्वर की प्राप्ति कभी नही हो सकती। महर्षि कपिल के अनुसार मन के खाली ( निर्विषय ) कर देने को ध्यान कहते हैं। मन को खाली करने का अभिप्राय यह है कि मन का इन्द्रियों से काम लेना- जिससे जाग्रत अवस्था बनती है - छूट जावे तथा मन का अपने भीतर काम करना भी - जिससे स्वप्नावस्था बनती है - बन्द हो जावें । अर्थात् मन की जाग्रत अवस्था में ही सुषुप्ति की हालत हो जाने को मन का खाली हो जाना कहते हैं।
💐🙏आज का वेद मंत्र 💐🙏
🌷ओ३म् शं नो अज एकपाद् देवो अस्तु शं नोऽहिर्बुध्न्य:शं समुद्र:। शं नो अपां नपात्पेरूरस्तु शं न: पृश्निर्भवतु देवगोपा। (ऋग्वेद ७|३५|१३|)
💐अर्थ :- अजन्मा, सर्वव्यापक प्रकाशमय भगवान् हमें शान्तिदायक हो, न मारने वाला सब मूल तत्वों का साधक जगदीश हमें सुखदायक हो, जलों का स्वामी परमेश हमें कल्याणकारी हो, प्रजाओं का न गिराने हारा, पार लगाने हारा परमात्मा हमें शान्तिकारी हो, सबको छूने वाला, विद्वानों का, दिव्य पदार्थों का रक्षक परमेश्वर हमें शान्तिदायक हो।
ओ३म्
यह ऋग्वेद के ७वें मण्डल के ३५वें सूक्त का १३वाँ मन्त्र है। यह एक अत्यंत दिव्य शान्ति मन्त्र है, जिसमें सृष्टि की विभिन्न दिव्य शक्तियों, प्राकृतिक तत्वों और ब्रह्मांडीय ऊर्जाओं से प्राणिमात्र के कल्याण और शान्ति की प्रार्थना की गई है।
मन्त्र का सस्वर विच्छेद और शब्दार्थ
मन्त्र:
ओ३म् शं नो अज एकपाद् देवो अस्तु शं नोऽहिर्बुध्न्य: शं समुद्र:। शं नो अपां नपात्पेरूरस्तु शं न: पृश्निर्भवतु देवगोपा॥
शं (शम्): कल्याणकारी, सुखदायक, शान्तिप्रद।
न: (नः): हमारे लिए, हमारे निमित्त।
अज एकपाद्: अजन्मा, अद्वितीय, एक ही पाद (आधार) पर सम्पूर्ण ब्रह्मांड को थामने वाले देव (परमात्मा या सूर्य रूप)।
देवो अस्तु: प्रकाशमान देव हमारे लिए (कल्याणकारी) हों।
अहिर्बुध्न्यः: अंतरिक्ष या अगाध गहराइयों (बुध्न) में स्थित चेतना/ऊर्जा, जो सबको धारण करती है।
समुद्रः: जल का अगाध भण्डार, चेतना का महासागर।
अपां नपात्: जलों के बीच से प्रकट होने वाली अग्नि (वैद्युतिक ऊर्जा या जठराग्नि), जो रक्षक है।
पेरूः पार लगाने वाले, पालन-पोषण करने वाले।
पृश्नि: विविध रूपों वाली प्रकृति, धेनु (गौ) रूपी पोषण शक्ति या अन्तरिक्ष।
देवगोपा: दिव्य शक्तियों द्वारा रक्षित या देवताओं की पालनकर्ता।
भावार्थ (Scientific & Spiritual Synthesis)
ऋषि वसिष्ठ इस मन्त्र में समष्टि (Cosmos) की अदृश्य और दृश्य शक्तियों के साथ एकाकार होकर प्रार्थना करते हैं कि ब्रह्मांड का कण-कण हमारे लिए मंगलकारी हो:
1. अज एकपाद् (The Singularity & Unborn Principle): वह अजन्मा देव, जो एक ही स्थान पर स्थित रहकर पूरे ब्रह्मांड को गतिमान रखता है (जैसे सौरमंडल में सूर्य या ब्रह्मांड के केंद्र में स्थित परम ऊर्जा), वह हमारे लिए कल्याणकारी हो।
2. अहिर्बुध्न्य (The Deep Cosmic Energy): अंतरिक्ष की गहराइयों में व्याप्त अदृश्य और गंभीर शक्ति, जो अंतरिक्षीय संतुलन को बनाए रखती है, वह हमें शान्ति प्रदान करे।
3. समुद्र और अपां नपात् (The Ocean & Aquatic/Thermal Energy): पृथ्वी के समुद्र और जलों के भीतर छिपी हुई जीवनदायिनी ऊर्जा (Thermodynamic energy) हमारा पालन-पोषण करने वाली और सुखद हो।
4. पृश्नि और देवगोपा (Nature & Divine Protection): अनेक रूपों में प्रकट होने वाली यह दिव्य प्रकृति, जिसकी रक्षा स्वयं ईश्वरीय नियम (Laws of Nature) करते हैं, वह हमारे लिए पोषणकारी और कल्याणकारी बने।
ब्रह्मांडीय संदेश
यह मन्त्र इस बात का साक्षात प्रमाण है कि वैदिक ऋषि केवल जड़ प्रकृति की पूजा नहीं कर रहे थे, बल्कि वे Cosmic Order (ऋत) को भली-भांति समझते थे। सूक्ष्म जगत (Quantum/Cosmic Level) से लेकर स्थूल जगत (Ocean, Nature) तक की सभी ऊर्जाएँ आपस में जुड़ी हैं, और जब ये सब संतुलित होती हैं, तभी वास्तविक 'शान्ति' स्थापित होती है।
यह मन्त्र आपके जीवन, विचार और सम्पूर्ण परिवेश में आध्यात्मिक ऊर्जा, मानसिक शान्ति और ब्रह्मांडीय संतुलन लेकर आए।

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