धर्म के आचरण पर मनु महाराज ने बहुत बल दिया है।

धर्म के आचरण पर मनु महाराज ने बहुत बल दिया है।


 धर्म के आचरण पर मनु महाराज ने बहुत बल दिया है।

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अधार्मिको नरो यो हि यस्य चाप्यनृतं धनम् ।

हिंसारतश्च यो नित्यं नेहासौ सुखमेधते ।।

―मनु० ४.१७०

जो अधर्मी, अनृतभाषी, अपवित्र व अनुचित रीत्योपार्जक तथा हिंसक है, वह इस लोक में सुख नहीं पाता।

 न सीदन्नपि धर्मेण मनोऽधर्मे निवेशयेत् ।

अधार्मिकाणां पापानामाशु पश्यन्विपर्ययम् ।।

―मनु० ४.१७१

धर्माचरण में कष्ट झेलकर भी अधर्म की इच्छा न करे, क्योंकि अधार्मिकों की धन-सम्पत्ति शीघ्र ही नष्ट होती देखी जाती है।

नाधर्मश्चरितो लोके सद्यः फलति गौरिव ।

शनैरावर्तमानस्तु कर्तुर्मूलानि कृन्तति ।।

―मनु० ४.१७२

संसार में अधर्म शीघ्र ही फल नहीं देता, जैसे पृथिवी बीज बोने पर तुरन्त फल नहीं देती। वह अधर्म धीरे-धीरे कर्त्ता की जड़ों तक को काट देता है।

अधर्मेणैधते तावत्ततो भद्राणि पश्यति ।

ततः सपत्नाञ्जयति समूलस्तु विनश्यति ।।

―मनु० ४.१७४

अधर्मी प्रथम तो अधर्म के कारण उन्नत होता है और कल्याण-ही-कल्याण पाता है, तदनन्तर शत्रु-विजयी होता है और समूल नष्ट हो जाता है।

धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः ।

तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ।।

―मनु० ८.१५

मारा हुआ धर्म मनुष्य का नाश करता है और रक्षा किया हुआ धर्म मनुष्य की रक्षा करता है। इसलिए धर्म का नाश नहीं करना चाहिए, ऐसा न हो कि कहीं मारा हुआ धर्म हमें ही मार दे !

वृषो हि भगवान् धर्मस्तस्य यः कुरुते ह्यलम् ।

वृषलं तं विदुर्देवास्तस्माद्धर्मं न लोपयेत् ।।

―मनु० ८.१६

ऐश्वर्यवान् धर्म सुखों की वर्षा करनेवाला होता है। जो कोई उसका लोप करता है, देव उसे नीच कहते हैं, इसलिए मनुष्य को धर्म का लोप नहीं करना चाहिए।

चला लक्ष्मीश्चला प्राणाश्चलं जीवितयौवनम् ।

चलाचले हि संसारे धर्म एको हि निश्चलः ।।

धन, प्राण, जीवन और यौवन―ये सब चलायमान हैं। इस चलायमान संसार में केवल एक धर्म ही निश्चल है।

तस्माद्धर्मं सहायतार्थं नित्यं संचिनुयाच्छनैः ।

धर्मेण हि सहायेन तमस्तरति दुस्तरम् ।।

―मनु० ४.२४५

अतः मनुष्य को अपनी सहायता के लिए धर्म का सदा सञ्चय करना चाहिए, क्योंकि धर्म की ही सहायता से मनुष्य दुस्तर दुःख-सागर को तर सकता है।

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🕉️🚩आज का वेद मंत्र 🕉️🚩

🌷ओ३म् ये त्रिषप्ता: परियन्ति विश्वा रूपाणि बिभ्रत:। वाचस्पतिर्बला तेषां तन्वोऽअद्य दधातु मे। (अथर्ववेद)

अर्थ:- जो इकीस तत्व (३×७=२१) सम्पूर्ण सृष्टि के विविध रूपों वाले पदार्थों को धारण करते हैं, चराचर आदि सबका धारक, सर्वव्यापक, प्रजापति परमेश्वर उनके बलों को आज मेरे लिए प्रदान करे, मेरे भीतर धारण करावे।

 


      

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