🔥 नीति में सदवृत्त का नियम है कि गुरु का सम्मान करना चाहिए क्योंकि माता- पिता के बाद ' मातृमान् पितृमानाचार्यवान् पुरुषों वेद '
(शतपथ ब्राह्मण) के अनुसार आचार्य याने गुरु ही हमें सही मायने में मनुष्य बनाने वाला होता है। जो उचित आहार-विचार को ग्रहण करने तथा अनुचित आहार-विहार को त्यागने की शिक्षा एवं ज्ञान देता है वही 'आचार्य 'होता है।
गुरु की महिमा महान है। ' को वा गुरूर्वो हि हिपोपदेष्टा ' के अनुसार ऐसा महिमावान गुरु कौन है? - ( वही)हितकारी उपदेश देता हो।
गुरु शब्द गु और रू इन दो अक्षरों से बना है। गु अक्षर का अर्थ है अंधकार और अज्ञान तथा रू शब्द का अर्थ है हटाने वाला। अज्ञाननिवर्तकत्वात् 'गुरूरित्यभिधीयते' के अनुसार जो जो अज्ञान दूर करता है वही गुरु होता है। जो ऐसा नहीं करता वह न तो आचार्य होता है और न गुरु होता है।
माता-पिता के अलावा जो भी हमें सत्य, शिव और सुन्दर का ज्ञान कराये वह गुरु होता है।
पत्थर और सोना दोनों ही खदान से निकलते हैं। पत्थर को गढ़ने वाला उसे जैसा बनाता है वैसा ही उसका उपयोग और मूल्यांकन होता है। एक पत्थर नाली में लगता है और एक पत्थर मूर्ति बनकर मन्दिरों में रखा जाता है। सोना मूल्यवान होते हुए भी आभूषण के रूप में बना दिये जाने पर ही उपयोग में आता है। यही स्थिति मनुष्य की है।मात्र मनुष्य रूप में जन्म लेने से ही कुछ नही होता बल्कि मनुष्य रूप् में अपने आचार-विचार को ढालने से हम मनुष्य याने मानव हो सकते हैं।
🙏आज का वेद मंत्र
ओ३म् इन्द्रो विश्वस्य राजति। शं नोऽअस्तु द्विपदे शं चतुस्पदे। ( यजुर्वेद ३६.८)
अर्थ :- हे परमेश्वर ! आप सारे जगत् के स्वामी रूप में प्रकाशमान है। आपकी कृपा से हमारे पुत्रादि, मनुष्यादि व दोपाये सुख प्राप्त करे तथा गौ आदि चौपाये कल्याण को प्राप्त हो।
ओ३म्। यह वेदमन्त्र यजुर्वेद के ३६वें अध्याय का ८वाँ मन्त्र है, जो ईश्वर से संसार के सभी जीवों के लिए शान्ति और कल्याण की प्रार्थना करता है।
मन्त्र का सस्वर पाठ और अर्थ
ओ३म् इन्द्रो विश्वस्य राजति। शं नोऽअस्तु द्विपदे शं चतुष्पदे॥
इन्द्रः = परम ऐश्वर्यशाली परमात्मा, जो सबका रक्षक और स्वामी है।
विश्वस्य = इस सम्पूर्ण ब्रह्मांड या संसार पर।
राजति = सुशोभित है, राज करता है या शासन करता है।
शम् = कल्याणकारी, सुखकारी, शान्तिप्रद।
नः = हमारे लिए।
अस्तु = होवे।
द्विपदे= दो पैरों वाले जीवों (मनुष्यों आदि) के लिए।
चतुष्पदे= चार पैरों वाले जीवों (पशुओं आदि) के लिए।
भावार्थ
इस मन्त्र में ईश्वर की सर्वोपरि सत्ता को स्वीकार करते हुए सर्वकल्याण की भावना व्यक्त की गई है:
यह सम्पूर्ण ब्रह्मांड उस परम ऐश्वर्यशाली परमात्मा (इन्द्र) के नियम और शासन में चल रहा है। वही इस सृष्टि का वास्तविक राजा है। हम उस न्यायकारी प्रभु से प्रार्थना करते हैं कि उसकी कृपा से हमारे संसार में रहने वाले सभी दो पैरों वाले जीवों (मनुष्यों) को सुख-शान्ति मिले और साथ ही सभी चार पैरों वाले मूक प्राणियों (पशुओं) का भी कल्याण हो।
यह मन्त्र वैदिक संस्कृति के "वसुधैव कुटुम्बकम्" और प्राणिमात्र के प्रति दया भाव (Universal Peace) का एक सुन्दर उदाहरण है, जहाँ केवल अपने लिए नहीं, बल्कि सृष्टि के हर छोटे-बड़े जीव के लिए मंगल कामना की गई है।

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