🔥विचारों से मनुष्य महान् बनता है तथा विचारों से ही पतित होता है। मनुष्य शब्द का अर्थ ही विचार करना है!!!
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"मत्वा कर्माणि सीव्यतीति मनुष्यः।"
अर्थात् जो विचार कर कर्म करता है, उसे ही मनुष्य कहा जाता है।
हमारे द्वारा किया जाने वाला कोई भी कर्म पाप है या पुण्य ? इसकी जानकारी के लिए हमें पता लगाना होगा कि वह कर्म किस विचार से किया गया है।
"यदि विचार भ्र्ष्ट हों तो प्रत्येक कर्म पाप हो सकता है तथा विचार उत्तम हो तो कोई भी कर्म पुण्य बन सकता है।"
एक उदाहरण से इसे समझा जा सकता हैः----
आप बताएँ कि किसी को चाँटा मारकर उसका दिल दुखाना पाप है या पुण्य ? आप कहेंगे कि दिल दुखाना पाप है। अब आप बताएँ कि पुत्र या शिष्य गलती करें और हम उसके हित की कामना करते हुए उसे चाँटा मार दें तो उसका दिल तो दुखेगा ही, किन्तु क्या वह पिता या गुरु का कर्म पाप है ? एक माँ अपने बच्चे को नहलाती है, धोती है, साफ करती है, बच्चा जोर-जोर से रोता है----क्या माँ पाप कर रही है ? एक डॉक्टर ऑपरेशन करते हुए शरीर के अंगों को चीरता है या काटकर निकाल देता है, मरीज को कष्ट होता है----किन्तु यह पाप है ? नहीं , कष्ट पहुँचाने वाला कर्म पुण्य बन जाता है, यदि विचार हित करना हो। यदि विचार अहित करना हो तो सुखदायक कर्म भी पाप बन जाता है। मधुमेह के रोगी व्यक्ति को मीठा खिलाना सुखदायक है, किन्तु उचित भी है क्या ? नहीं। इसलिए किसी भी कर्म के पाप या पुण्य होने में उद्देश्य (विचार) देश, काल तथा परिस्थिति ये चार ही मुख्य कारण है।
अशुभ विचार से किया हुआ यज्ञकर्म भी पाप बन सकता है। आप यज्ञ कर रहे हैं, इसलिए जिससे शत्रु का नाश हो जाए, पडोसी का अकल्याण हो, इस भावना के साथ या अहंकार के साथ कि मैं इतना यज्ञ करता हूँ तो समझ लेना कि वह यज्ञ पुण्य नहीं होगा।
किसी व्यक्ति ने लाखों रुपयों की सम्पत्ति छोडकर वैराग्य ग्रहण कर लिया है, अच्छी बात है, किन्तु यदि वहीं व्यक्ति बार-बार कहे कि उसने लाखों रुपयों को लात मार दी है तो समझ लेना कि उसकी लात ठीक से नहीं लगी है।
दान यदि अहंकार पैदा करें, त्याग यदि अभिमानी बना दे, यज्ञ यदि ईर्ष्यालु बना दे, पूजा यदि पुजापे के लिए हो तो मत समझना कि वह सच्चे अर्थों में दान, यज्ञ, पूजा और त्याग है।
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🚩‼️आज का वेद मंत्र ‼️🚩
🌷ओ३म् अग्निश्च मे घर्मश्च मेऽर्कश्च मे सूर्यश्च मे प्राणश्च मेऽश्वमेधश्च मे पृथिवी च मेऽदितिश्च मे दितिश्च मे द्यौश्च मेऽङ्गुलय: शक्वरयो दिशश्च मे यज्ञेन कल्पन्ताम्॥ यजुर्वेद १८-२२॥
💐 अर्थ :- मेरा यज्ञ (त्याग), पुरुषार्थ और परमेश्वर के आशीर्वाद से --- मेरी आंतरिक अग्नि (जीवन ऊर्जा), मेरी उपासना, मेरा सांस, मेरे मन की शांति, मेरा जीवन, मेरा देश और उसका शासन, मेरी पृथ्वी, मेरा आकाश, मेरी इंद्रियां और उन पर नियंत्रण --- इन सब की, सब के हित में समृद्धि और वृद्धि हो।
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